मंगलवार, 2 नवंबर 2010

मेरी प्रेयसी मेरी कविता

दुःख की घड़ी में

मेरे साथ रहती है
मेरी प्रेयसी मेरी कविता
हाथों में लिए
ढाढ़स के अनगिणत शब्द
और
सुख के क्षण में
बिखरती रहती है
मेरी प्रेयसी मेरी कविता
गंध और स्पर्श के सहारे
जब मैं कटता हूँ दुनिया से
एकमात्र
मेरी कविता मुझसे जुड़ती है
अनुभूति की बाहें फैलाकर
और
जब मैं रमता हूँ दुनिया में
मेरी कविता ही बनती है
माध्यम
अभिव्यक्ति की
शोक में हर्ष में
अपकर्ष और उत्कर्ष में
रण और वन में
हरपल मेरे मन में
विचरती रहती है
मेरी प्रेयसी मेरी कविता
मैं समाता हूँ
अपनी कविता की इयत्ता में
और यही
दुनिया में अकेली
मेरी परवाह करती है
मैं देता हूँ इसे
रूप
यह देती है मुझे
परिभाषा
दुनिया के सारे
अर्थ, संबंध, रिश्ते, भाव, राग
उस मुकाम पर
पहुँचने का साधन मात्र है
जहाँ
मैं और मेरी प्रेयसी
निर्बाध मिल सके
मेरी प्रेयसी कविता
मेरी अंतिम खोज है .

2 टिप्‍पणियां:

  1. सच साहित्य होता ही है सबसे अच्छा दोस्त.

    आपने प्रेयसी बनाया , भावार्थ वही है.

    - विजय

    http://www.hindisahityasangam.blogspot.com/

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  2. मुझे आपकी यह कविता बहुत पसंद है डॉक्टर साहब !!

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