रविवार, 21 जून 2020

नेचुरल समाजवादी विचारधारा है बरसात।

बरसात में
दूबों के भी हरे-हरे
पर निकल आते हैं।
पथरीली और बंजर जमीनों की भी
गोद भराई हो जाती है।
बरसात में पेड़ लगाने के ही अनुष्ठान नहीं होते
खुद ब खुद काई भी उगा करती है।
सभी को पनपने की बेहिसाब आजादी
मिल जाती है,
जिससे चीजें बिगड़ने लगती है
बरसात में।
सदा चुप रहने वाले हरे पेड़-पौधे भी
बेतरतीब रूप से फैलने लगते हैं
अब तक लोहे के बड़े-बड़े औजारों की देखरेख में
 फौजी अनुशासन में करीने से खड़ा
आंख को सुहाता 
विशाल बगीचा
और पोर्टिको का पालतू नस्ली पौधा 
भी
पैनी नजर की मांग करने लगता है।
बरसात में
यूँ तो
अंग्रेजी नाम वाले पौधे
काफी खरच कर लगाया जाता है
जैविक खाद और माकूल मिट्टी के नीचे 
मगर
बरसात तो
पत्थर पर फूल खिला देता है।
जिसे हम
खर-पतवार, घास-फूस, काई समझते हैं।
बरसात उसे भी जी लेने का अवसर देता है।
नेचुरल समाजवादी विचारधारा है बरसात।

गुरुवार, 11 जून 2020

पगडंडी

वे तो बस नियमित चला करते रहे
उन्हें पता भी नहीं था 
कि 
उनके चलने से भी निशान बनते हैं
छोटी सी पगडंडी है 
इसे कुछ एक से जाने पहचाने लोगों ने 
आदतन नंगे पांव चलकर बनाया है 
पहले पहल झाड़-झाड़ी दबे
तलवे तले हरी घास पीली हुई 
फिर मिट्टी की एक लकीर खिंच गई
यही लकीर पगडंडी बन गई।
क्योंकि 
नंगे पैरों में एक अपना अनुशासन था
उसकी थाप वहीं पड़ते रहे 
जहां पड़ा करते थे 
अक्सर बनती है पगडंडियां
खेतों से होकर 
इसलिए पता होता है 
चलने वालों को अपना दायरा
एक कदम भी इधर-उधर होने से
पौधों की दुनिया में आपका अतिक्रमण हो सकता है 
पगडंडियां वही बनेगी और बची रहेगी
जहां भीड़ ने अपने पैरों से कभी हमला न किया हो
 बूटों के गर्म दाग न लगे हों
और 
दनदनाती गोली की तरह 
मोटर लगी किसी दो पहिया वाहन ने
निशाना न बनाया हो
जो नहीं  जा सकते किराए की गाड़ी से 
और 
जिन्हें अपना सामान 
अपने ही सर पर उठाना होता है
उनके लिए ये पगडंडी एक सहज सवारी की तरह है 
गांव के संपन्न लोग अपनी गाड़ी से 
जितने समय में सड़क होकर सदर बाजार पहुंचते हैं 
उससे भी कम समय में 
पगडंडी की सवारी कर बाजार पहुंचा जा सकता है 
सड़क की सवारी करने वाले भी
पगडंडी का लेते रहे हैं सहारा
मगर
उनसे कभी कोई पगडंडी बन नहीं पाया है
किसी भी सरकारी दस्तावेज में 
पगडंडी का कोई जिक्र नहीं मिलता है 
और ना ही 
किसी योजना से उस पर कोई काम हुआ है 
असल में तो 
सरकारी योजना से पगडंडी बन भी नहीं सकती
या यूं कहिए कि 
सरकारी योजना से कोई राह नहीं निकल पाने के कारण ही
पगडंडी बना करती है
पगडंडी कभी सदा के लिए नहीं बनती
इसका कोई इतिहास  नहीं है 
इसका भविष्य भी नहीं है 
इसे सुरक्षित रखने का भी कोई रिवाज नहीं है 
जबकि सहूलियत के रूप में 
हमेशा से काम आता रहा है
मगर किसी बड़े महापुरुष के नाम पर 
आज तक किसी ने भी 
कभी पगडंडी का कोई नामकरण नहीं किया है 
बेनाम रह जाती है पगडंडी 
और शायद इसीलिए 
इसके योगदान का कोई मूल्यांकन नहीं करता 
जरूरत में पगडंडी ने कितना साथ दिया 
इस पर कोई नहीं सोचता 
हमारे जीवन का अहम हिस्सा रही है पगडंडी 
मगर जब हमें कोई बड़ा काला सा सड़क दिखता है 
जिसके किनारों पर उजली पट्टियां चमकती हो 
हम खुश हो जाते हैं अपनी प्रगति पर 
पगडंडी हमारे पिछड़ेपन की निशानी बनकर रह जाती है
काली सड़क ने हमेशा
रफ्तार वाली पहियों को सहारा दिया है
नंगे पैरों को हमेशा जलाया है
नंगे पैरों ने हमेशा पगडंडियों को चाहा है।
अब जबकि मजबूरी में पैदल चलना
पिछड़ेपन की निशानी है
मेरी
कविता की पगडंडी 
पगडंडी की कविता
कई लेन वाली पक्की चौड़ी सड़क  के बीच 
और कितने दिनों तक अपना अस्तित्व बचा पाएगी 
या कि बना भी पाएगी
इसपर संदेह है पर अफसोस नहीं है।

शुक्रवार, 5 जून 2020

इन्हीं मायनों ने हमें जानवर रहने नहीं दिया है।

जब हमारे पास किसी को मारने का
कोई कारण नहीं होता
और
हम मार देते हैं
हम जानवर नहीं होते हैं,
इंसान होते हैं।
हजारों साल से हम इंसान हैं।
हजारों साल रहेंगे।
हमारे पूर्वज  जितने समय तक निर्दोष रहे
जानवर थे
वन गुफा कंदराओं जंगलों में रहते थे।
फिर हममें लालच पैदा हुआ
हम इंसान हो गए।
हमें जज्बाती दुनिया से निकाल दिया गया।
अब हमने
मतलब की दुनिया उगा रक्खी है।
जहां
प्यार करना
नफरत करना
हँसना,रोना
सबके मायने होते हैं।
इन्हीं मायनों ने हमें जानवर रहने नहीं दिया है।