रविवार, 10 अक्टूबर 2010

सद्भाव की राजनीती नहीं हो सकती है क्या ?

राम जन्मस्थान और बाबरी मस्जिद विवाद में अदालत ने अमन और सद्भाव की एक राह दिखाई है। यह राह किसी एक पार्टी को चुनाव भले न जितवा सके पर इसमें भारतीय समाज की व्यापक जीत दिखाई पड़ रही है।

यह निर्णय सचमुच इतिहास के बोझ को अपनी पीठ से उतार कर आगे चलने और उसे उसकी जगह पर स्थापित करने की सीख है। इस राह को इस देश की जनता देख रही है, अयोध्यावासी देख रहे हैं, मुकदमे के पक्षकार हासिम अंसारी भी देख रहे हैं।

तमाम आशंकाओं और अनिश्चितताओं के बावजूद जनता ने 30 सितंबर को जिस अद्भुत संयम और सद्भावना का परिचय दिया है, उसको देखकर दुनिया ही नहीं खुद भारतवासी भी हैरान हैं। यह कानून के राज और न्यायपालिका में बढ़ती हमारी आस्था और हजारों साल के समन्वय वाले महान भारत की झलक है।

भारतीय जनता का यह संयम 1992 के इतिहास पर हंसने और नए भारत के भविष्य के सपने देखने का विश्वास देता है, लेकिन जिन्हें राजनीति करनी है, वे इस समझदारी को नहीं देख रहे हैं। इसे वे भी नहीं देख रहे हैं, जिनके लिए अयोध्या एक बहाना था और असली मकसद नफरत फैलाना था। वे भी नहीं देख रहे हैं, जिनके लिए यूरोप के चर्च और राज्य के संबंधों के आधार पर गढ़ी गई धर्मनिरपेक्षता की एक कठोर और नास्तिक परिभाषा में किसी तरह का कोई रूपांतरण नहीं किया जा सकता।

हमारे संविधान की प्रस्तावना में लिखी गई धर्मनिरपेक्षता की कोई परिभाषा कहीं नहीं दी गई है और उसकी विद्वान अपने-अपने ढंग से व्याख्या करते रहे हैं। इसी के चलते कई बार विवाद भी होता है। इसी नाते अदालत ने धर्मनिरपेक्षता की यूरोपीय परिभाषा से हटकर भारत की सांप्रदायिक सद्भावना के सिद्धांत को ध्यान में रखकर फैसला दिया है।

हमारा स्वाधीनता संग्राम और उसके नायक महात्मा गांधी इसी भावना के आधार पर देश का निर्माण करना चाहते थे। यह भावना साझी विरासत और साझी शहादत की है। दिक्कत यह है कि जनता इस भावना को आगे बढ़ाते हुए राजनीतिक और सामाजिक सुलह का मानस बना रही है, तो राजनीतिक दल इसमें अपने-अपने वोट बैंक और कट्टरता के लिहाज से इसकी गलत व्याख्या करने में लग गए हैं।

कोई कह रहा है कि इस फैसले से हमारा कोई लेना-देना नहीं और इसे लागू करने की जिम्मेदारी हम नहीं ले सकते। दूसरी तरफ यह दावे भी जोर- शोर से किए जा रहे हैं कि यह फैसला कानून और साक्ष्य पर नहीं, आस्था के आधार पर दिया गया है। यह सुलह और सद्भाव की राह में कांटे बोने का प्रयास है।

हमें ध्यान रखना होगा कि अभी यह निर्णय तीन महीने तक लागू नहीं होगा और जो भी पक्ष असंतुष्ट हैं, उनके लिए सुप्रीम कोर्ट जाने का रास्ता खुला हुआ है। यहां यह भी ध्यान देने की बात है कि यह फैसला छह दिसंबर 1992 की घटना पर नहीं आया है। अभी जो फैसला आया है, वह भारतीय विधि शास्त्र और हमारी न्यायपालिका के विवेक की एक झलक है। इस पर सर्वोच्च न्यायपीठ की दृष्टि अभी पड़नी बाकी है।

राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे इसे आइडियोलॉजी का मुद्दा न बनाकर आम राय बनाकर निपटाएं। अगर वे अब भी ऐसा नहीं कर सकते तो इसे अपनी न्यायिक यात्रा पूरी करने दें। हो सकता है उसके बाद किसी नवीन दृष्टि की प्राप्ति हो या तब तक हमारी राजनीतिक समझ का स्तर और ऊंचा उठ जाए।

उमर की फिसलन :भारत को ठेस

अलगाववादी आंदोलन से घिरे जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने राज्य के भारत में विलय पर सवाल खड़े कर हुर्रियत के नेता गिलानी और मीरवाइज उमर फारूक को भले खुश कर दिया हो, लेकिन उसे जम्मू सहित देश के बाकी हिस्सों में एक खतरनाक फिसलन की तरह देखा जा रहा है। कहा जा रहा है कि राज्य पर राजनीतिक और प्रशासनिक पकड़ बनाने में नाकाम रहे उमर अब सारा ठीकरा केंद्र के सिर फोड़कर अपनी कुर्सी बचाने मे लगे हैं।

यह अब्दुल्ला परिवार की पुरानी रणनीति रही है। जब वह कश्मीर में आजादी समर्थकों से घिरता है, तो भारत विरोधी बयान देने लगता है और जब दिल्ली आता है तो देशभक्त बन जाता है। दूसरी तरफ यह भारत की भी मजबूरी है कि उसे कश्मीर में वैसा विश्वसनीय राजनेता मिल नहीं पाया है। इसीलिए कांग्रेस पार्टी ने उमर अब्दुल्ला के बयान का समर्थन भी किया है।

कश्मीर की सत्ता को पाने और उसे संभालने की यही रणनीति अब महबूबा मुफ्ती भी अपनाने लगी हैं। इस तरह अलगावादी शेर की सवारी करने वाले कश्मीर के नेताओं के बीच इस काम के लिए एक तरह की प्रतिस्पर्धा भी है। इस होड़ की तात्कालिक वजह तो कश्मीर के मुख्यमंत्री का पद है। पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती कांग्रेस के संपर्क में हैं और बीच में उनकी पार्टी के कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाने की चर्चाएं भी तेज हो गई थीं।

सरकार में भी उमर अब्दुल्ला की विफलता को गंभीरता से लिया जा रहा है। उन्होंने जिस तरह घाटी के स्कूल खोले जाने के फैसले को गृह सचिव जीके पिल्लई का फैसला बताकर उससे अपने को अलग किया है और प्रधानमंत्री के आर्थिक और रोजगार संबंधी पैकेज को नकारा है, उससे भी अलग समीकरण के संकेत मिल रहे हैं। कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार उनसे निजात पाना चाहती है, लेकिन वे गांधी-नेहरू और अब्दुल्ला परिवार के पुराने संबंधों का हवाला देकर अपने को टिकाए रखना चाहते हैं।

यही वजह है कि तीन महीनों की जबरदस्त अशांति के बाद भी राहुल गांधी ने उनके कंधे पर हाथ बनाए रखा। एक राजनीतिक गठजोड़ के सहयोगी दल का यही धर्म भी है, पर यह धर्म तभी तक निभाना चाहिए, जब तक इससे राष्ट्र और जनता का हित सधता हो। अगर इससे इन दोनों हितों पर आंच आने लगे तो उसमें परिवर्तन के बारे में सोचा जाना चाहिए।

कश्मीर का विलय पूर्ण था या अर्ध, अनुच्छेद 370 का ठीक से पालन हुआ या नहीं, स्वायत्तता का नया स्वरूप क्या होना चाहिए आदि ऐसे सवाल हैं जो कश्मीर ही नहीं, भारत के अस्तित्व से भी जुड़े हैं। उन्हें ज्यादा बयान देकर भड़काना उचित नहीं है, तो उन पर ढुलमुल राय भी ठीक नहीं है। बयान और राय के इस विवाद से आगे जरूरत इस बात की है कि कश्मीर में ठोस पहल हो।

कश्मीर में वार्ताकार की नियुक्ति में देरी और फिर उन्हें काम करने के लिए लंबा समय देने से कोई लाभ नहीं होगा। अगर राज्य में सत्ता परिवर्तन से हालात और बेहतर हो सकते हैं तो उसमें भी विलंब नहीं करना चाहिए। साथ ही पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के उन सुझावों पर भी विचार करना चाहिए कि सरक्रीक और सियाचिन की समस्या का पहले हल निकालने से कश्मीर में सुविधा होगी।

अद्वितीय रचनाशीलता का सम्मान

देर आयद दुरुस्त आयद। हर स्पेनी भाषी की जुबां पर यही लफ्ज़ है। 2010 का नोबेल पुरस्कार पेरू के मारिओ वार्गास ल्योसा को मिला है। नोबेल पुरस्कार 11 साल बाद दक्षिण अमेरिका लौटा है। इस खबर पर कोलम्बिया के महान लेखक एवं नोबेल विजेता गार्सिया माख्रेज़ ने अपनी प्रतिक्रिया ट्विटर पर देते हुए कहा, ‘अब हम बराबर हैं।’

दोनों की प्रतिद्वंद्विता जग जाहिर है, हालाँकि एक समय में दोनों करीबी दोस्त हुआ करते थे, यहाँ तक कि ल्योसा ने अपनी पी एच डी थीसिस माख्रेज़ पर लिखी थी जो 1971 में स्टोरी ऑफ अ देइसिदे के नाम से प्रकाशित हुई। 1976 में ल्योसा ने माख्रेज़ को जबर्दस्त घूँसा मारा था और तब से दोनों में बातचीत बंद है। 2010 के नोबेल पुरस्कार के साथ मारिओ वार्गास ल्योसा के ऐसे कई किस्से अब पौराणिक गाथा बन जायेंगे।

मारिओ वार्गास ल्योसा का जन्म 28 मार्च, 1936 में एक मध्यमवर्गीय परिवार में पेरू के आरेकीपा नामक प्रांत में हुआ। माता-पिता के तलाक के चलते उनकी परवरिश ननिहाल में हुई। 14 की उम्र में उनके पिता ने उन्हें लीमा मिलिट्री अकादमी भेजा, लेकिन उन्होंने अकादमी छोड़ दी और पिउरा में पढ़ाई खत्म करके अखबार में नौकरी कर ली। 1953 में उन्होंने अपने से 13 साल बड़ी जूलिया उर्कीदी से शादी कर ली। शादी 9 साल में टूट गई और उन्होंने एक साल बाद अपनी चचेरी बहन पेत्रिशिया ल्योसा से शादी की जिससे उनके 3 बच्चों हैं।

ल्योसा का पहला उपन्यास ‘ला सिउदाद ई लोस पेरेस’ (शहर और कुत्ते) 1963 में प्रकाशित हुआ। यह लीमा मिलिटरी स्कूल के कैडेटों की कहानी है और लेखक के अपने अनुभवों पर आधारित है। पहले उपन्यास को बहुत प्रशंसा और सफलता मिली। आलोचकों ने ल्योसा की जीवंत और निपुण जटिल लेखन शैली कि तारीफ की और इस उपन्यास को प्रेमिओ दे क्रितिका एस्पन्योला (स्पेनी आलोचक पुरस्कार) प्राप्त हुआ, लेकिन इस उपन्यास में पेरू के सैन्य प्रतिष्ठान कि कड़ी आलोचना से वहां हड़कंप भी मचा। कई जनरलों का कहना था कि यह एक ‘पतित दिमाग’ का काम था और वह इक्वाडोर की पेरू की सेना के खिलाफ साजि़श थी।

1965 में उनका दूसरा उपन्यास ‘ला कासा वेर्दे’ (हरा घर) प्रकाशित हुआ। यह कहानी कासा वेर्दे (हरा घर) नामक कोठे की कहानी है और उसकी पौराणिक उपस्थिति पात्रों की जिंदगी पर कैसे असर करती है। इस उपन्यास को भी आलोचकों ने सराहा और इसे इतने पुरस्कार मिले कि मारिओ वार्गास ल्योसा का नाम दक्षिण अमेरिका के महत्वपूर्ण लेखकों में लिया जाने लगा। बहुत से आलोचकों का आज भी मानना है कि ला कासा वेर्दे ही ल्योसा की सबसे बड़ी कृति है। मशहूर आलोचक जेराल्ड मार्टिन का मानना है कि ला कासा वेर्दे दक्षिण अमेरिका के साहित्य का सबसे महत्वपूर्ण उपन्यास है।

तेतीस की उम्र में उनका तीसरा उपन्यास ‘कोन्वेर्ससिओन एन ला कातेद्रल’ (कैथ्रेडल में बातें) 1969 में प्रकाशित हुआ। यह कहानी है मिनिस्टर के बेटे सान्तिएगो जवाला और उसके ड्राईवर आम्ब्रोसियो की। दोनों की बातचीत होती है कैथ्रेडल नामक एक बार में और इस बातचीत के जरिये जवाला पेरू के नामी अंडरवर्ल्ड बदमाश की हत्या में अपने पिता की भूमिका की सचाई पता लगाने की कोशिश करता है। हालांकि उसे न कोई जवाब मिलता है न किसी बेहतर भविष्य की उम्मीद, और इस बातचीत के जरिये ल्योसा तानाशाही पर तीखी टिप्पणी करते हैं।

पूरे उपन्यास में निराशा का स्वर इसे मारियो वार्गास ल्योसा की सबसे कटु कृति बना देता है। इस उपन्यास के बाद ल्योसा ने राजनीति और सामाजिक दिक्कतों से हट कर व्यंग्य की और रुख किया। इस दौर में उन्होंने ‘पंतालेओं य लॉस विसितादोरास’ (कैप्टेन पान्तोखा और उनकी मेहमान) लिखी जो एक तरह से ला कासा वेर्दे कि पैरोडी है।

1977 में ल्योसा ने ‘ला तिया खुलिया य एल एस्क्रिबिदोर’ (आंटी जूलिया और कथाकार) प्रकाशित की। यह उपन्यास उन्होंने जूलिया उर्कीदी को समर्पित किया और उनकी पहली शादी पर ही आधारित है। 1981 में ल्योसा ने अपना चौथा और पहला ऐतिहासिक उपन्यास ‘ला गैर्रा देल फिन देल मुन्दो’ (दुनिया के अंत का युद्ध) लिखा। यह उपन्यास 19 शताब्दी के ब्राजील के कानुदोस युद्ध को दर्शाता है और इससे ल्योसा एक बार फिर संजीदे लेखन को लौटते हैं।

वार्गा ल्योसा के इस उपन्यास में इन्सान का हिंसा को आदर्श बनाने कि प्रवृति का अनवेशंड और धर्मान्धता के चलते इंसानों द्वारा रचित तबाही के विवरण ने लेखक को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया। वार्गास ल्योसा का कहना है कि यह उनकी सबसे प्रिय और सबसे मुश्किल कृति है, और फिर शुरू हुआ दौर कुछ छोटे उपन्यास लिखने का जिनमें ‘हिस्तोरिया दे मायता’ (मायता का इतिहास) और ‘किएन मातो आ पालोमीनो मोलेरो’ (पालोमीनो मोलेरो को किसने मारा?) उल्लेखनीय हैं।

मारियो वार्गास ल्योसा के लेखन में इतिहास और व्यक्तिगत अनुभव का मिश्रण होता है। उनकी कृतियों में दुखद और बेतुकी स्थितियों का मानवीय विवरण है और उनके देश पेरू में बीसवीं सदी के महानगर का शोर, आत्मा की जटिलताएं, नागरिकों की आवाज, अपने समय कि समस्याओं और जुनून का परिदृश्य है।

डायलॉग की साहित्यिक तकनीक से मारिओ वार्गास ल्योसा अपनी लेखन शैली को एक नया रूप देते हैं। ला कासा वेर्दे में अलग अलग समय पर हो रही बातचीत को जोड़कर ल्योसा फ्लैशबैक का भ्रम पैदा करते हैं तो कभी एक समय पर अलग अलग जगह पर हो रही दो बातचीतों को जोड़कर स्थानान्तरण का अनुभव पैदा करते हैं।

मारियो वार्गास ल्योसा की रचनाओं को आधुनिकतावादी और उत्तर आधुनिकतावादी दोनों माना जाता है। उनकी शुरुआती रचनाओं, जैसे ला कासा वेर्दे और कोन्वेर्ससिओन एन ला कैथ्रेडल की तकनीकी जटिलता और उनके संजीदा स्वर के मद्देनजर उन्हें आधुनिक साहित्य का हिस्सा माना जाता है और बाद में आने वाले उपन्यास जैसे ला तिया खुलिया ई एल एस्क्रिबीदोर, एल आव्लादोर (कथाकार) और हिस्तोरिया दे मायता को उत्तर आधुनिक शैली का हिस्सा माना जाता है क्योंकि इनका स्वर व्यंगात्मक है।

कई दक्षिण अमेरिकी लेखकों की तरह ल्योसा ने भी क्यूबा में फिदेल कास्त्रो की क्रान्ति और शासन को समर्थन दिया था, लेकिन धीरे धीरे उनको लगा की वहाँ का समाजवाद आजादी के खिलाफ था और वामपंथ से मुंह मोड़ कर वो दक्षिणपंथ कि तरफ मुड़ गए। 1990 में उन्होंने राष्ट्रपति के पद के लिए चुनाव लड़ा। उनका मुद्दा था निजीकरण और फ्री ट्रेड। उन्हें अल्बेरतो फ्युजीमोरी ने हराया। सन् 1990 से मारिओ वार्गास ल्योसा लंदन में रह रहे हैं और साल में लगभग 3 महीने पेरू में बिताते हैं। उन्होंने स्पेन कि नागरिकता भी ली है।

मारियो वार्गास ल्योसा की रचनाएँ दुनिया भर में कई भाषायों में अनुदित हुई हैं और पत्रकारिता में भी उनका अहम् योगदान रहा है। मारियो ल्योसा को साहित्य और ख़ासतौर से उपन्यास को बढ़ावा देने का श्रेय मिलता है और एक महान लेखक को, दक्षिण अमेरिका की एक महत्वपूर्ण आवाज को नोबेल पुरस्कार ने अंतरराष्ट्रीय मान्यता दी है।

ऊंट :रेगिस्तान का जहाज

भारत-पाकिस्तान सरहद पर बसे रेगिस्तानी जिले बाड़मेर के ऊंट विश्व भर में अपनी खास पहचान रखते हैं। ‘रेगिस्तान के जहाज’ के नाम से मशहूर इन ऊंटों की पशुपालक खास देखभाल करते हैं। एक दशक में ऊंटों की संख्या में काफी कमी आई है। कभी ग्रामीण अंचलों में ऊंट घर-घर की जरूरत रहे हैं। रेगिस्तानी धोरों में संचार व यातायात के बेहतर साधनों में ऊंटों का ही उपयोग किया जाता था, तो खेतों में जुताई का कार्य भी ग्रामीण ऊंटों के माध्यम से करते थे। संचार, यातायात और कृषि के आधुनिक साधनों और संसाधनों के बढ़ते प्रभाव ने ऊंटों का महत्‍व कम कर दिया। ऊंट कभी पशु मेलों जान हुआ करते थे। ऊंटों की कीमत लाखों रुपयों में लगती थी। आज ऊंट पालकों को ऊंटों की पर्याप्‍त कीमत पशु मेलों में नहीं मिलने से पशुपालको को नये-नये जतन करने होते हैं। ऊटों की खूबसूरती बढ़ाने के लिए अब विशेष ब्‍यूटी पार्लर खुल गए हैं, जहां ऊंटों को सजाया-संवारा जाता है। डेर्जट ब्‍यूटी पार्लर ऐसा ही सैलून है, जहां ऊंटों के लिए विशेष कटिंग का प्रावधान है। सैलून संचालक मगाराम बताते हैं कि ऊंटों की कीमतें अब कम हो जाने के कारण ऊंट पालकों के सामने आजीविका का संकट खडा हो गया है। ऊंट पालक अपने ऊंटों को खास लुक देने के लिए विशेष कटिंग करवा कर खरीदारों का ध्‍यान आकर्षित करते हैं। इससे कई मर्तबा ऊंट पालको को अच्छे खरीददार मिल जाते हैं। आजकल ऊंटों के शरीर पर, विशेष तौर से बाल कटिंग कर, तरह-तरह के टैटू बनाए जाते हैं। यह टैटू ऊंटों में विशेष आकर्षण पैदा करते हैं। मगाराम के अनुसार विशेषज्ञ टैटू कटिंग के 500 से 700 स्पये तक लेते हैं। उधर जैसलमेर में आने वाले देसी-विदेशी पर्यटकों के लिए भी ऐसे ऊंट विशेष आकर्षण का केन्द्र होते हैं। रेगिस्तान में ‘कैमल सफारी’ के लिए विशेष कटिंग वाले ऊंटों की बुकिंग हाथोंहाथ हो जाती है, साथ ही किराया भी अच्छा मिलता है। ‘कैमल सफारी’ का काम करने वाले सादिक खान ने बताया कि ऊंटों का रूप संवारने के लिए पैसा खर्च करने का लाभ मिलता है। ऊंटों के बालों पर तरह-तरह के कटिंग करा कर फूल-पत्तियां, बेल-बूटे, पक्षी आदि की डिजाईन उकेरते हैं। सैलानियों को इस तरह की डिजाईनें बेहद पसन्द आती हैं तथा ‘कैमल सफारी’ लिए ऐसे ऊंट पहली पसन्द होते हैं। पूर्व में इस तरह ऊंटों के सैलून नहीं थे, मगर विभिन्न पशु मेलों में इसका प्रचलन देख बाड़मेर और जैसलमेर में ‘कैमल ब्‍यूटी पार्लर’ काफी मात्रा में खुल गए हैं, जो ‘रेगिस्तान के जहाज’ ऊंटों को संवारने का काम करते हैं। पूर्व में पशुपालक स्वयं ऊंटों के बाल काटते थे। ग्रामीण क्षेत्रों में सभी पशुपालक एक स्थान पर एकत्रित होकर ऊंटों के बाल सामुहिक रूप से काटते थे। अब कैमल सैलूनों का प्रचलन बढ़ गया .

स्कूल हैं कि सीखते नहीं

काम जरा मुशकिल है, लेकिन इसी जाड़े की किसी ठंडी सुबह थोड़ी सी हिम्मत दिखाएं। शाल, मफलर, टोपी वगैरह जो कुछ भी है सब कुछ लपेटिये और सुबह छह बजे घर से बाहर आ जाएं। अगर इतवार नहीं है तो आपको वहां चार बरस या उससे ज्यादा उम्र के बच्चे स्कूल की बस का इंतजार करते मिल जाएंगे। अब आप चाहें तो इन बच्चों की हिम्मत को दाद दे सकते हैं, या फिर स्कूलों के बेदर्द रवैये को लानत। लेकिन इससे आगे आप कुछ नहीं कर सकते। आप क्या इनके आगे तो सरकार भी बेबस है। कोहरे में लिपटी सुबह की ठंड में जब बड़े लोग रजाई में करवट बदलने से भी घबराते हैं, इन बच्चों को हाथ मुंह धोकर, तैयार होकर घर से निकलना ही पड़ता है। बच्चों को यह मजबूरी देने वाले स्कूलों के पास बहुत सारे बहाने हैं- सिलेबस पूरा होना जरूरी है, पहले ही बहुत छुट्टियां हो गई, एक्जाम का टाइम है तो बच्चों को तो आना ही पड़ेगा। ये स्कूल टाइम आगे नहीं बढा़ सकते, सेशन थोड़ा सा खिसका नहीं सकते, यानी बच्चों पर हो रहे इस अत्याचार का पूरे समाज के पास कोई विकल्प नहीं है।

क्या स्कूल व्यवस्था के नाम पर हमने कुलजमा ऐसी स्थितियां रच ली हैं कि उनके गुलाम बने रहने के अलावा कोई चारा नहीं? किसी भी स्वस्थ समाज से हम यह उम्मीद करते हैं कि वह बदलते हालात में जीवन को पहले से ज्यादा सुखद बनाने के विकल्प ढूंढेगा। लेकिन हम क्यों नहीं ढूंढ पाते? और हां, इस विकल्प को खोजने के लिए किसी अतिरिक्त बजट या संसाधन की भी जरूरत नहीं है। जिस समाज में इतना छोटा सा समाधान मौजूद न हो उससे यह उम्मीद कैसे की जाए कि वहां सभी गरीबों के लिए अलाव और कंबल वगैरह की व्यवस्था हो सकेगी।

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

बेचारे गीतकार!

देर तक ब्लॉग से अनुपस्थित रहने के लिए क्षमा। मैं लिखना और कुछ चाहता था, लेकिन कॉपीराइट वाले मसले पर जावेद अख्तर और आमिर खान के झगड़े ने मुझे कुछ दूसरा लिखने के लिए सूत्र दे दिया। झगड़ा यह था कि गाने की लोकप्रियता में स्टार का हिस्सा बड़ा होता है या उस गाने के बनाने वालों, यानी गायक, संगीतकार, गीतकार इत्यादि का। इसमें भी सबसे कम श्रेय मिलता है बेचारे गीतकार को।

हम गाने को फिल्म से जोड़कर देखते हैं, ‘लता का या रफी का गाना’ जैसे पहचानते हैं, शंकर जयकिशन या आरडी बर्मन को भी याद करते हैं, आम श्रोता कितने गानों के गीतकारों को जानते हैं? इसकी वजह यह भी है कि मुंबइया फिल्म उद्योग में कलम घसीटने को कोई बड़ा काम नहीं माना जाता। सब कहते हैं कि अच्छे लेखक नहीं मिलते, लेकिन उस उद्योग में लेखक की जो हैसियत है, उसे देखते हुए कौन वहां जाना चाहेगा।

मेरा मुद्दा यह है कि गाने की लोकप्रियता में गीतकार का हिस्सा जितना महत्वपूर्ण होता है, उतना उसे श्रेय नहीं मिलता। मैं उदाहरण देता हूं- राहुल देव बर्मन बहुत प्रतिभाशाली थे, सब जानते हैं और मानते हैं। आरडी की सबसे अच्छी फिल्में याद कीजिए। सबसे पहले वे सारी फिल्में याद आएंगी, जिनमें गुलजार के गीत हैं, इजाजत, किनारा वगैरा। ‘लव स्टोरी 42′ जो आरडी की आखरी फिल्म थी और जिसका संगीत बहुत अच्छा था, उसमें गीतकार जावेद अख्तर थे। इसके अलावा मजरूह सुल्तानपुरी के साथ की फिल्में, तीसरी मंजिल, कारवां वगैरा। आनंद बख्शी अपनी तरह के कुशल गीतकार थे, लेकिन काव्यात्मक स्तर पर सबसे कमजोर थे, उनके साथ आरडी के लोकप्रिय गीत बहुत हैं, लेकिन ज्यादातर चालू गीत हैं, एकाध ‘अमर प्रेम’ छोड़कर। आरडी को याद किया जाएगा तो ‘तीसरी मंजिल’ के लिए या ‘इजाजत’ के लिए। बल्कि मेरा मानना है कि अपना सर्वश्रेष्ठ सृजन करने के लिए आरडी को ज्यादा काव्यात्मक गीतों की जरूरत पड़ती थी, गुलजार के साथ उनकी प्रतिभा जैसे निखरती थी वैसी किसी के साथ नहीं निखरी।

आनंद बख्शी का मैं सम्मान करता हूं, बल्कि उनकी मृत्यु पर मैंने लिखा भी था। फिल्म उद्योग के ज्यादातर नामी गीतकार फिल्मों के बाहर भी प्रतिष्ठित कवि थे। साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी, जाँ निसार अख्तर, शैलेन्द्र मूलत: साहित्यिक कवि थे, जिन्होंने फिल्मों में भी शानदार गीत लिखे। इन सबके कविता संग्रह छपे हैं, और उनको काफी ख्याति भी मिली है। लेकिन आनंद बख्शी शुद्ध फिल्मी गीतकार थे, वे जरूरत के हिसाब से शब्द ढालने में माहिर थे। उनके गीत लोकप्रिय जरूर होते थे, लेकिन आप उन्हें साहिर या शैलेन्द्र की टक्कर में नहीं रख सकते।

दूसरा उदाहरण लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का है। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल अपने जमाने के नामी संगीतकार थे, एक दौर था जब एक ओर लक्ष्मीकांत प्यारेलाल और दूसरी ओर आर डी बर्मन, दो ही का सिक्का चलता था। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल बेहद गुणी संगीतकार तो थे लेकिन किसी संगीत प्रेमी से पूछिए तो वह मानेगा कि उनका सबसे अच्छा संगीत तब का है जब वे धार्मिक या स्टंट फिल्मों के संगीतकार थे। ‘पारसमणि’, ‘हम सब उस्ताद हैं’, ‘मिस्टर एक्स इन बाँबे’, ‘हरिश्चन्द्र तारामती’, ‘सती सावित्री’ का संगीत कमाल का है। ‘दोस्ती’ और ‘मिलन’ से वे टॉप पर पहुंचे। इन दोनों फिल्मों का संगीत बहुत अच्छा है। लेकिन उसके बाद उनके संगीत की गुणवत्ता वह नहीं रही। बाद के उनक गानों में ‘मेरे महबूब कयामत होगी’ या ‘तुम गगन के चंद्रमा हो’ जैसा कोई गाना बताइए।

मेरी नजर में इसकी वजह यह है कि ‘मिलन’ के पहले वे कई गीतकारों के साथ काम करते थे। असद ‘भोपाली’ से लेकर तो भारत व्यास तक ने उनके लिए गाने लिखे। ‘मिलन’ के बाद उनकी जोड़ी आनन्द बख्शी के साथ बन गई और फिर वह मजा नहीं रहा। ‘सत्यकाम’ फिल्म के गाने बहुत अलग हैं, क्योंकि उसके गीतकार थे कैफी आजमी। लोकप्रियता के आखरी दौर में उन्होंने ‘उत्सव’ फिल्म में कमाल का संगीत दिया है, उस फिल्म के गीतकार वसंत देव थे। काव्यात्मक शब्द ही श्रेष्ठ गीत बना सकते हैं, यह सत्य है। शैलेन्द्र की मृत्यु के बाद शंकर जयकिशन का क्या हुआ। लेकिन इस मुद्दे पर फिर विस्तार से।

आवाज ही पहचान है

हिंदी फिल्मों में सबसे बड़ी तादाद में खराब गीत किसने गाए? यहां बात कुमार शानु और हिमेश रेशमिया की नहीं है, सचमुच के गायकों की बात हो रही है। मेरे ख्याल से इसका जवाब होगा- लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी और किशोर कुमार। वजह साफ है लता मंगेशकर लंबे वक्त तक सबसे लोकप्रिय गायिका रही, मोहम्मद रफी पहले और बाद में किशोर कुमार सबसे लोकप्रिय पुरुष गायक रहे। इसकी वजह से सारे संगीतकार इन्हीं से गाने गवाते थे। हिंदी सिनेमा में जाहिर है अच्छे गाने कम बनते हैं, साधारण या बुरे गाने ज्यादा बनते हैं, इसलिए बुरे गाने भी इन्हीं के ज्यादा होते थे। दूसरी बात यह है कि चूंकि वे लोकप्रिय थे इसलिए उन्हें ऐसे गाने भी गाने को मिलते थे जो उनकी आवाज से बहुत मेल नहीं खाते थे। तलत महमूद, मुकेश, गीतादत्त आदि के बुरे गाने इसलिए कम हैं उनको तभी गाना मिलता था जब संगीतकार को लगता था कि यह गाना उनकी आवाज में ही अच्छा लगेगा, और संगीतकार अपनी चला भी पाता था। फिल्म उद्योग में ऐसा कम ही होता था कि संगीतकार जिसे चाहे उससे गाना गवा ले (अब शायद होता होगा क्योंकि अब जो गाने चलते हैं उन्हें कोई भी गाए, क्या फर्क पड़ता है)। फिल्म में पैसा लगाने वाला, निर्माता, निदेशक, हीरो, हीरोइन, सब अपनी पसंद चलाना चाहते थे और चूंकि सबकी इच्छा यह होती थी कि गाना लोकप्रिय बने इसलिए वे सबसे हिट गायक को चुनते थे। मन्ना डे को अभी दादासाहेब फाल्के पुरस्कार मिला है इसलिए यह किस्सा काफी लोगों को मालूम हो गया होगा कि फिल्म ‘चोरी-चोरी’ के गाने मन्ना डे से गवाने के लिए शंकर-जयकिशन को काफी संघर्ष करना पड़ा था। एक बार तो निर्माता ने रिकार्डिग कैंसल करके मन्ना डे को लौटा दिया था। शंकर-जयकिशन अपने जमाने में कोई ऐसे वैसे संगीतकार नहीं थे, उनकी हैसियत हीरो-हीरोइन से बड़ी होती थी। उन्होंने समझा-बुझाकर निर्माता को राजी किया और मन्ना डे भी अपमान को भुला कर रिकार्डिग के लिए आए। हमें ‘आजा सनम मधुर चांदी में हम’ और ‘ये रात भीगी-भीगी’ जैसे गाने मिले और मन्ना डे की सिर्फ धार्मिक या देशभक्ति के गानों के अलावा भी पहचान बनी।

सितारों के भी नखरे होते हैं। ‘आदमी’ फिल्म का दोगाना ‘एक चांद आसमान पे है, एक मेरे साथ है’ मोहम्मद रफी और तलत महमूद की आवाज में नौशाद ने रिकार्ड किया था। तलत का सितारा तब तक डूब चुका था और मनोज कुमार बड़े स्टार थे, उन्होंने तलत महमूद की आवाज अपने लिए इस्तेमाल होने का विरोध किया। नौशाद ने तब तलत वाले हिस्से को गाने के लिए मुकेश से संपर्क किया। मुकेश, तलत महमूद के जिगरी दोस्त थे, सो उन्होंने गाने से मना कर दिया। तब गाना महेन्द्र कपूर की आवाज में रिकार्ड किया गया। अब हाल यह है कि रिकार्ड में गाना तलत ने गाया है और फिल्म में महेन्द्र कपूर की आवाज है। मदन मोहन भी तलत के प्रिय दोस्त थे और प्रिय गायक भी, लेकिन आखिर के लगभग दस साल वे तलत से एक गाना नहीं गवा सके। मैं अक्सर सोचता हूं कि शायद आखरी गीत मोहब्बत का सुना लूं या ‘आपके पहलू में आ कर रो दिए’ के वक्त मदन मोहन को तलत की याद आई होगी। ‘तुम्हारी जुल्फ के साए में शाम’ या ‘तेरी आंखों के सिवा दुनिया में’ तो पक्के मोहम्मद रफी के गाने हैं, या हो सकता है कि दस साल पुराना वक्त होता तो मदन मोहन तलत को ही याद करते।

कभी-कभी आर्थिक वजहों से भी संगीतकार अपने प्रिय गायक से नहीं गवा पाते, यह दूसरा पक्ष है। बड़े गायक ज्यादा पैसे लेते हैं और छोटा निर्माता देने की हालत में नहीं होता। किशोर कुमार के तो किस्से मशहूर हैं कि वे पूरा-पूरा पैसा लिए बिना नहीं गाते थे। लता अपनी फीस कम जरूर कर सकती थीं लेकिन या तो सम्माननीय संगीतकारों के लिए या लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जैसे नए लोगों के लिए जिन्हें वे प्रोत्साहित करना चाहती थी। राजू भारतन ने लिखा है कि सी. अर्जुन ने उन्हें बताया कि एक धुन उन्होंने ऐसी बनाई (संभवत: ‘पास बैठो तबीयत बहल जाएगी’) कि उन्हें लगा कि यह मदन मोहन की टक्कर की धुन है और वे मोहम्मद रफी से उसे गवाना चाहते थे। निर्माता के पास पैसा नहीं था, सी. अर्जुन डरते-डरते मोहम्मद रफी के पास गए। मोहम्मद रफी दरियादिल आदमी थे, उन्होंने बहुत कम पैसा लेकर वह गाना गा दिया। गाना शानदार बनता है बोल, धुन, वाद्यवृंद की संरचना और गायक की आवाज के सही मेल से, इनमें से एक भी सुर गड़बड़ लगा तो सारी संगीत रचना बेसुरी हो जाती है। इन दिनों अक्सर मैं यह खेल मन ही मन खेलता हूं कि ऐसा कौन सा गाना है जो किसी दूसरे गायक की आवाज में अच्छा लगेगा। ऐसी ही कुछ बातें अगली बार।