शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

डॉ लोहिया की नर-नारी समता और बहुपत्नी प्रथा की चुनौती

डॉ लोहिया व्यक्ति स्वातंत्रय, समता और प्रेम के अनन्य उपासक थे। पर उनका यह भी मानना था कि स्वतंत्रता और समता के बिना प्रेम संभव नहीं है। इसलिए वे प्रेम की अनिवार्य शर्त के रूप में पहली दोनों स्थितियों को पैदा करना चाहते थे। अपने आदर्शों के समाज की स्थापना के लिए वे मौजूदा समाज की कमियों को चिह्नित करते थे और उन पर न सिर्फ अपने समय के अर्थशास्त्रीय और समाजशास्त्रीय तर्कों से हमला करते थे, बल्कि इस काम में इतिहास और मिथक दोनों का सहारा लेते थे। लेकिन एक बात स्पष्ट है कि आमतौर पर यूरोप के औपनिवेशिक प्रभावों का कठोर प्रतिकार करने वाले डॉ लोहिया जातिगत समानता और नर-नारी समता के मामले में आधुनिक यूरोपीय दृष्टि से गहरे प्रभावित हैं। वे यूरोप और अमेरिका में स्त्री की स्थिति को काफी अच्छा मानते हैं और उसे एक आदर्श के रूप में देखते हैं। इस आधु्निक दृष्टि से वे एशिया और गैर यूरोपीय देशों की तमाम परंपराओं की कड़ी आलोचना करते हैं। हालांकि इस बीच वे भारत के पौराणिक पात्रों में द्रौपदी जैसी क्रांतिकारी प्रतीक ढूंढ लाते हैं और सीता-सावित्री के मुकाबले उन्हें ज्यादा महत्व देने की बात करते हैं। लोहिया के निधन के 43 साल बीत चुके हैं और तब से अब तक स्त्री विमर्श काफी लंबी यात्रा तय कर चुका है। स्त्री विमर्श और स्त्री अधिकारों पर यूरोप और एशिया के बीच कभी बहुपत्नी प्रथा तो कभी हिजाब के रूप में सभ्यताओं का टकराव भी सामने आता रहता है। एक तरफ नर-नारी समता (जेंडर इक्ललिटी) के सिद्धांत के आधार पर पालिगैमी और बुरके को खारिज किया जाता है तो दूसरी तरफ इस्लामी नारीवादी की एक नई धारा उसे व्यावहारिकता और जीवन पद्धति के चयन के लोकतांत्रिक अधिकारों के आधार पर उचित साबित करती है।

इस संदर्भ में डॉ लोहिया का सबसे नवीनतम विचार ‘यौन-शुचिता और नर-नारी संबंध’ शीर्षक से 1967 की जनवरी-फरवरी में (जन-मैनकाइंड के) संपादकीय के रूप में छपा है। संभवत: यही विचार व्यस्थित लेख के रूप में है भी। बाकी उनके स्त्री संबंधी अधिकारों के जो भी विचार हैं वे भाषण के रूप में है। हालांकि तर्क सभी में एक से ही हैं। पर भाषणों में लोगों को प्रेरित करने के लिए अनौपचारिक संवाद ज्यादा हैं। जैसे-बड़ी जाति की स्त्रियों के मन में छोटी जाति के पुरुषों के प्रति आकर्षण या छोटी जाति की स्त्रियों के मन में बड़ी जाति के पुरुषों के प्रति आकर्षण का सरस वर्णन। या फिर इसके विपरीत भी जो कुछ हो सकता है वह सब भी मजेदार रूप में। दरअसल जाति और लिंगभेद को बदल कर रख देने की उनकी इच्छा सारे संबंधों को खंगाल कर रख देना चाहती थी। इसी भावना से उन्होंने 1953 के जनवरी माह में ‘जाति और यौनि के कटघरे’ नामक जोरदार भाषण दिया था। इसमें उन्होंने इन दोनों कटघरों को सभी बीमारियों की जड़ बताते हुए कहा था कि हमें यह गलतफहमी रखनी नहीं चाहिए कि गरीबी दूर कर देने से यह कटघरे टूट जाएंगे। ‘‘जाति और औरत का जो ढांचा इस समय देश में बना हुआ है उससे पतन के अलावा और कोई परिणाम नहीं निकलता। आत्मा के पतन के लिए यह दोनों कटघरे मुख्यत: जिम्मेदार हैं। यह साहस और आनंद की पूरी क्षमता को खत्म कर देते हैं। गरीबी मिटाने से वे खत्म नहीं होते। क्योंकि वे दोनों एक दूसरे के कीटाणुओं पर पनपते हं’’ लेकिन जाति और लिंगभेद को समान रूप से त्याज्य मानने वाले लोहिया के विचारों का प्रतिकार उन्हीं के अनुयायी तब कर बैठते हैं जब स्त्रियों के आरक्षण का सवाल आता है। वे महिलाओं को आरक्षण दिए जाने को पिछड़े वर्गों के खिलाफ एक साजिश मानते हैं। वे यह भी भूल जाते हैं कि डॉ लोहिया की सप्तक्रांतियों में सबसे ऊपर नर-नारी समता का ही एजेंडा रहा है। इस सिलसिले में डॉ लोहिया का मार्च 1960 का ‘सुंदरता और त्वचा का रंग’ का व्याख्यान काफी महत्वपूर्ण है। एक लिहाज से वह बीसवीं सदी के आखिरी दशक के मध्य में आई नौमी वुल्फ की किताब ‘द ब्यूटी मिथ’ का बीज मंत्र लगता है। आज का सौंदर्य प्रसाधन उद्योग जिस तरह त्वचा के रंग की श्रेष्ठता और उसे बदल डॉलने के झूठे मिथक पर फल-फूल रहा है वह भाषण इस तरह के उपभोक्तावाद को समझने की एक कुंजी भी है।

इसी कड़ी में डॉ लोहिया का सबसे महत्वपूर्ण व्याख्यान 22 जून 1962 को नैनीताल में समाजवादी युवजन सभा के प्रशिक्षण शिविर में द्रौपदी या सावित्री पर केंद्रित है। इस भाषण में वे भारतीय नारी के आदर्श को मूल रूप से बदल देने को व्याकुल दिखते हैं। वे द्रौपदी के बहुपतियों के जीवन पर विशेष जोर न देते हुए उसकी पुरुष प्रधानता को चुनौती देने वाले और कभी हार न मानने वाले गुणों की तारीफ करते हैं। यहां वे द्रौपदी के साहस, तर्कशीलता जैसे गुणों की विशेष तारीफ तो करते ही हैं साथ में उसके सांवलेपन को एक सामयिक आदर्श के रूप में स्थापित करते हैं। यहां वे बहुपत्नी प्रथा पर कठोरता पूर्वक प्रहार करते हुए सवाल भी करते हैं, ‘‘औरत को हिंदुस्तान में बहुत ही दुखी बना दिया गया है। हमने कई दफा सोचा कि क्या बात है? अभी उसके ऊपर आखिरी फैसला हम नहीं कर पाए हैं। बहुपत्नी प्रथा हिंदुस्तान में क्यों रही है?…..अब तो गैरकानूनी हो गई है। मुसलमानों में यह प्रथा अब भी है।…लेकिन मैं यह साफ कह देना चाहता हूं कि यह गंदी बात है। मुसलमान औरतें जब बुर्का पहन कर चलती हैं तो कई दफे तबीयत होती है कि कुछ करें। लेकिन क्या बताएं कुछ करने बैठ जाएं तो और गड़बड़ हो जाए। फिर वे कहते हैं कि साहब हमारे धर्म में लिखा हुआ है। चार औरतें तो कर ही सकते हैं। भले मुसलमान हैं वे बताते हैं धर्म में लिखा हुआ है कि चारों के साथ बिल्कुल बराबरी हो। यहीं फिर द्रौपदी वाला किस्सा बता सकते हैं कि इतनी सर्वगुण संपन्न नारी नहीं कर पाई तो चारों के लिए बराबरी दिखा पाएंगे यह बिल्कुल असंभव चीज है।’’ लोहिया अपने विमर्श में यहीं नहीं रुकते बल्कि वे बहुपत्नी प्रथा को खारिज करने के लिए बहुपति प्रथा की चुनौती खड़ी करते हैं। वे कहते हैं, ‘‘मुझे नहीं मालूम कुरान में क्या लिखा है, क्या नहीं लिखा है। मैं खाली कह देना चाहता हूं कि जो मर्द औरत को चार पति रखने की इजाजत नहीं देता है, वह जब कहता है, किसी भी आधार पर, धर्म हो, कि चार औरतें रखने का हक होना चाहिए, तो वह बड़ा गंदा मर्द है। उसको नई दुनिया में रहने की जगह है ही नहीं।’’
हिंदुस्तान और रंगीन नस्ल की बहुपत्नी प्रथा की आलोचना करते हुए वे यूरोप को बेहतर स्थिति में पाते हैं। वे कहते हैं, ‘‘गोरी दुनिया में एक भी उदाहरण मुझे अब तक नहीं मिला है पिछले हजार, दो हजार, चार हजार, पांच हजार वर्ष के इतिहास में जहां किसी मर्द ने, चाहे साधारण मर्द, चाहे राजा मर्द, कोई बहुत बड़ा आदमी जो होता है- एक से ज्यादा औरतों से एक साथ शादी की हो।’’

इस सवाल को वे बहुत मजबूती से उठाते हैं और इसके ऐतिहासिक कारणों में जाने की बेचैनी दिखाते हैं। इसीलिए वे सुझाव भी देते हैं कि इस मामले पर गहन शोध किया जाना चाहिए। वे कहते हैं, ‘‘यह कोई छोटा प्रश्न नहीं है कि गोरी दुनिया में कोई मर्द एक साथ एक से ज्यादा औरत से, साधारण जमाने में शादी नहीं कर पाया, लेकिन हमारी रंगीन दुनिया में उसको यह अधिकार परंपरागत रहा है। यह एक ऐसा विषय है जिसके ऊपर कोई आप में से -बड़ा कठिन विषय है, 5-10 वर्ष लगा सकते हैं-अध्ययन करके कोई किताब लिखो तो बढ़िया चीज होगी।’’

रंगीन (कलर्ड) नस्लों में हिंदू समाज ने बहुपत्नी प्रथा को भले लगभग छोड़ दिया हो पर सभी जातियों ने छोड़ दिया है ऐसा नहीं है। हाल ही में दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जूमा ने पांचवीं शादी की तो काफी विवाद हुआ। हालांकि उन्होंने इसे निजी और जुलू समाज का सामुदायिक मामला कह कर सही साबित करने की कोशिश की पर एचआईवी -एड्स से पीड़ित दक्षिण अफ्रीका की सिविल सोसायटी ने काफी हल्ला मचाया। पर बहुपत्नी प्रथा का यह मामला फ्रांस और ब्रिटेन सहित यूरोप के तमाम देशों को परेशान किए हुए है। फ्रांस ने बहुपत्नी प्रथा को लैंगिक समानता के खिलाफ बताते हुए 1993 में इस पर पाबंदी लगा दी। लेकिन अभी भी वहां लाखों लोग ऐसे हैं जो इस प्रथा के साथ जी रहे हैं। वे या तो बाहर से शादी करके वहां गए हैं या फिर कानून उनकी शादी के बाद बना है। वे महिलाओं को बहुपत्नी प्रथा छोड़ने के लिए लालच भी दे रहे हैं। इस प्रथा को मानने वालों में अफ्रीकी मूल के ज्यादा लोग हैं। फ्रांस में हिजाब को लेकर भी विवाद चल ही रहा है। उधर ब्रिटेन में बहुपत्नी प्रथा को इस आधार पर छूट देनी पड़ रही है कि उस व्यक्ति ने अपनी शादी बाहर किसी और देश में की है। विल डुरांट जैसे विद्वानों का मानना है कि बहुपति-प्रथा इस्लाम के उदय के पहले अरब देशों में भी थी। लेकिन वह व्यावहारिक नहीं थी। क्योंकि ऐसी स्थितियों में बच्चों के पितृत्व और उसके लालन-पालन का फैसला मुश्किल हो जाता था। हिस्ट्री ऑफ कल्चर में उन्होंने लिखा है कि बहुपति प्रथा अरब देशों के अलावा भारत के मालाबार इलाके के नायर समुदाय में भी थी। दरअसल यह प्रथा उन लोगों के लिए उपयुक्त थी जो युद्ध लड़ने का काम करते हैं। इसका मकसद यह था कि उनमें से किसी एक पर परिवार के पालन का बोझ न पड़े।
मनोवैज्ञानिक अध्ययनों ने पाया है कि बहुपति प्रथा न तो पुरुष के स्वभाव के अनुकूल है और न ही स्त्री के स्वभाव के। इसलिए यह चल नहीं पायी। इसका हश्र वैसा ही हुआ जैसा सेक्सुल कम्युनिज्म का। कार्ल मार्क्स के सहचिंतक फ्रेडरिक एंगिल्स इस प्रथा के हिमायती थे और उन्होंने रूस की क्रांति के बाद इसे लागू करने का सुझाव दिया था। लेकिन वह प्रयोग विफल रहा क्योंकि वह मनुष्य के स्वभाव के अनुकूल है नहीं।

बहुपत्नी प्रथा के समर्थकों का कहना है कि यह इस्लाम की देन नहीं है। इस्लाम ने इसे व्यवस्थित जरूर किया है पर इसका अस्तित्व इस्लाम से पहले का है। इसके पीछे पुरुषों के मुकाबले विवाह योग्य अधिक महिलाओं का होना एक कारण रहा है। युद्ध में पुरुषों के मारे जाने के कारण उनकी संख्या कम हो जाती थी, जबकि महिलाओं का जीवन राजनीतिक और स्वास्थ्य संबंधी कारणों से भी उतना जोखिम भरा नहीं होता था। इसलिए एक पुरुष के कई महिलाओं से विवाह की परंपरा शुरू हुई। यह स्थिति तब ज्यादा बनी जब मनुष्य और उसके कबीले शिकार पर निर्भर थे और विधिवत राज्य का गठन नहीं हुआ था। बाद में खेतिहर और औद्योगिक समाज बनने के साथ यह प्रथा कमजोर हुई है। लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान एक स्थिति यूरोप में भी ऐसी आई कि बर्ट्रेड रसेल तक को कहना पड़ा कि बहुपत्नी प्रथा होनी चाहिए। बहुपत्नी प्रथा के समर्थकों का कहना है कि यह प्रथा बहुत कुछ पुरुष की आर्थिक और सामाजिक हैसियत पर करती है। लेकिन विद्वानों का यह भी कहना है कि यूरोप की एकपत्नी प्रथा महज कानून की किताबों की चीज है। हकीकत में वहां विवाहेत्तर संबंधों की भरमार है। इसीलिए वैवाहिक जीवन अस्थिर और अल्पजीवी है। एक तर्क यह भी है कि यूरोप अवैध तरीके से चलने वाली बहुपत्नी प्रथा से तो बेहतर पूरब की वैध तरीके से चलने वाली बहुपत्नी प्रथा है। इस सिलसिले में इटली के राष्ट्रप्रमुख बर्लुस्कोनी का उदाहरण पेश किया जाता है। जो एक जिम्मेदार पद पर होते हुए भी अधिकतम महिलाओं से संबंध रखने का रिकार्ड कायम कर रहे हैं। इसी तरह से अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के भी विवाहेतर संबंधों का उदाहरण दिया जा सकता है। इसीलिए एक तर्क यह भी दिया जाता है कि दरअसल बहुपत्नी प्रथा ने एकपत्नी प्रथा को बचाया है। अगर वह न होती तो व्याभिचार ज्यादा होता। यूरोप के आलोचक एक तर्क यह भी देते हैं कि वहां समलैगिंकता को तो अनुमति दी जा रही है लेकिन बहुपत्नी प्रथा को प्रतिबंधित किया गया है। इसी के साथ वेश्यावृत्ति का सवाल भी जुड़ा हुआ है। यूरोप के देशों ने जिस प्रकार वेश्यावृत्ति को एक वैध व्यवसाय के रूप में मान्यता दी है वैसा यूरोप के बाहर के तमाम देश नहीं करना चाहते। यह भी कहा जाता है कि वेश्यावृत्ति वैसे तो दुनिया के सभी समाजों में रही है लेकिन विश्ययुद्ध के दौरान यूरोपीय देशों या फिर युद्ध में शामिल जापान जैसे हमलावर देश ने इसे बड़े पैमाने पर फैलाया। यही आज देह व्यापार के रूप में पूरी दुनिया में जारी है।

डॉ लोहिया जिस मध्य युग में गैर यूरोपीय देशों में महिलाओं की दशा खराब होने का दावा करते हैं उसके बारे में विद्वानों का यह भी मत है कि दरअसल उस दौरान इस्लाम ने महिलाओं को अधिकारों से संपन्न कर गरिमा प्रदान की। वह गरिमा यूरोपीय महिलाओं को बहुत बाद में मिली।

इसलिए जैसा कि डॉ लोहिया भी कहते हैं कि स्त्री और पुरुष संबंधो का आगे का रूप क्या होगा अभी कहा नहीं जा सकता। यह संबंध गतिशील हैं और नए-नए रूप लेते रहेंगे। लेकिन एक बात जो अभी की स्थिति से प्रतीत होती है वह यह है कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में नर-नारी संबंधों के अलग-अलग रूप हैं। उनमें समता कायम करने के प्रयास को विविधता से मदद ही मिलेगी न कि नुकसान होगा। समता को भी विविधता का सम्मान करना चाहिए। इनमें से किसी एक को आदर्श मानकर दूसरे पर थोपने के खतरे भी हैं। पर उसी के साथ यह भी सही है कि इक्कीसवीं सदीं में हर समाज की स्त्रियां अपने हक के लिए खड़ी हो रही हैं। ये आंदोलन बराबरी की किस सतह पर जाकर विश्राम करेंगे या कौन सा शिखर छूएंगे यह तो समय ही बताएगा।


स्वयं में एक मिथक थे डॉ. लोहिया

राम मनोहर लोहिया इतिहास भी हैं और मिथक भी। वे राजनीतिज्ञ भी हैं और धर्मगुरु भी। वे दार्शनिक भी हैं और राजनीतिक कार्यकर्ता भी। सचमुच आज के समाजवादी नेताओं को देखकर यकीन नहीं होता कि उनके आंदोलन में कभी इतनी विलक्षण प्रतिभा रही होगी। जिस तरह वे राम, कृष्ण और शिव को भारतीय पूर्णता का स्वप्न मानते हैं उसी तरह उनको भी भारतीय समाजवाद का स्वप्न माना जा सकता है।

कभी लगता है कि वे भारतीय राजनीति के नचिकेता हैं और अपने प्रश्नों से अपने पिता तुल्य राजनेताओं को उसी तरह व्यथित कर देते हैं जैसे नचिकेता ने अपने पिता वाजश्रवा को किया था। इससे यह भी लगता है कि उनके पास यमराज के पास जाने के अलावा कोई चारा नहीं हैं। लेकिन धर्म, संस्कृति और मिथकों पर सवालों से इतर अपनी व्याख्याओं से जिस तरह वे जनता को साराबोर कर उसे बदलने के लिए प्रेरित करते हैं उससे यह भी लगता है कि उनमें वाजश्रवा के पास लौटने की भी क्षमता है। डॉ. लोहिया अपने विमर्श, अपने कर्म और अपने प्रेम से शिव, राम और कृष्ण के मिलेजुले रूप लगते हैं। उनका यही रूप आगे के किसी समाजवादी आंदोलन को प्रेरित करेगा।
सवाल उठता है कि डॉ. राममनोहर लोहिया जैसे समाजवादी और नास्तिक राजनेता ने मिथक, धर्म और संस्कृति पर इतना समय और दिमाग क्यों खर्च किया? इससे समाज को फायदा हुआ या नुकसान? क्या उनके इसी झुकाव का परिणाम है हिंदी इलाके में हिंदुत्व की राजनीति का उदय? क्या इसीलिए संघ परिवार उन्हें अपने करीब पाता है और कहता रहता है कि उनकी आर्थिक नीतियां कम्युनिस्टों और सांस्कृतिक नीतियां संघ के करीब हैं? या फिर उनके विमर्शों को न समझ पाने के कारण हिंदी इलाके और विशेष तौर पर उनके जन्म क्षेत्र अवध में सांप्रदायिक झंझावात आया जिसके चलते बाबरी मस्जिद को तोड़े जाने का धतकरम किया गया? हिंदुत्ववादियों और डॉ. लोहिया के मिथक मंथन के उद्देश्य बिल्कुल अलग रहे हैं। एक का उद्देश्य सामाजिक कलुष पैदा करना तो दूसरे का उद्देश्य सामाजिक समता और प्रेम पैदा करना रहा है। डॉ. लोहिया मिथकों पर इतना जोर क्यों देते हैं और वे उसमें इतना रस क्यों लेते हैं? दरअसल वे यह बात बार-बार कहते हैं कि पिछले डेढ़ हजार साल में भारतीय इतिहास में न तो कोई बगावत हुई और न ही कोई बड़ा नायक पैदा हुआ। बल्कि इतिहास के इस दौर में भारत में अपने राज्य की अनुपस्थिति भी रही। जब मुगल शासकों के अंतिम दौर में उनका राज्य भारतीय जनता से तादात्म्य स्थापित करने लगा तो अचानक अंग्रेजों की पराया राज्य कायम हो गया। लोहिया के सामने इतिहास छोड़कर मिथक अपनाने के पीछे महज यही कारण नहीं है कि भारतीय इतिहास से ज्यादा मिथक पर जोर देते हैं। वे वास्तव में भारत के लंबे समय से पराजित इतिहास से व्यथित हैं। उन्हें अलीगढ़ स्कूल के इतिहासकारों से लेकर डॉ. ताराचंद और आरसी मजूमदार से इस बात की शिकायत है कि उन्होंने ठीक तरह से इतिहास नहीं लिखा। इतिहास की इस अंधेरी कोठरी से भयभीत डॉ. लोहिया हिंदू धर्म के मिथकों और प्रतीकों में रोशनी और ऊर्जा ढूंढते हैं। यानी इतिहास से निराश लोहिया मिथक और धर्म की तरफ भागते हैं। इस दौरान वे अपने समाजवाद की एक सांस्कृतिक योजना प्रस्तुत करते हैं।
डॉ. लोहिया की बातों को समझने के लिए हमें उनके समय और उद्देश्य पर गौर करना होगा। हमें डॉ. लोहिया के विचारों को समझने के लिए जिन तीन बातों पर विशेष तौर पर ध्यान देना होगा वे हैं :-(1) वे मूलत: कहां के थे? (2)-वे किस बात से सर्वाधिक व्यथित थे? (3)-वे करना क्या चाहते थे?
डॉ. लोहिया का जन्म फैजाबाद जिले(आज के अकबरपुर) में हुआ था जो अवध की राजधानी रहा है और जिसके जुड़वां शहर अयोध्या में राम के जन्म का मिथक लोकआस्था में गहराई से बैठा है। जाहिर है लोहिया को रामराज्य के आदर्श को महात्मा गांधी या किसी और बड़े नेता से सीखने की जरूरत नहीं थी। अवध के कण-कण में राम नाम गूंजता है और वह डॉ. लोहिया में आखिर तक गूंजता रहा। लोहिया पर जर्मनी की पढ़ाई और अमेरिका दौरे की काफी चर्चा होती है, उनकी अखिल भारतीयता भी उनके व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण अंग रही है। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि वे मूलत: अवध के थे। लोहिया के संपूर्ण विमर्श में स्थानीयता का विशेष महत्व रहा है। इसीलिए वे कहते भी हैं कि विश्ववाद की जुबान स्थानीय ही होगी। राम के चरित्र में तमाम कमियां हैं इस बात को लोहिया स्वीकार भी करते हैं फिर भी वे राम को छोड़ने को तैयार नहीं हैं। बालि को छल से मारना, सीता की अग्निपरीक्षा, सीता का वनवास और फिर शंबूक का वध यह सब ऐसे प्रसंग है जिनके कारण अगर लोहिया चाहते तो राम को अपने विमर्श में उसी तरह हाशिए पर फेंक सकते थे जिस तरह वे सीता, सावित्री और वशिष्ठ को दरकिनार करते हैं। लेकिन राम की कमियां जानते हुए भी वे उन्हें अस्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। जाति और यौन(कास्ट एंड जेंडर) के कटघरे तोड़ने के उनके अभियान में राम कहीं आड़े नहीं आते। जबकि उनसे पहले जाति को समूल नाश करने का अभियान चलाने वाले डॉ. अंबेडकर ‘रिडल्स इन हिंदुइज्म’ में राम को सीधे निशाने पर ले चुके थे। इसी के साथ यह भी सच है कि डॉ. लोहिया अंबेडकर से राजनीतिक गठजोड़ भी बनाने के प्रयास में जुटे थे। इससे यह भी लगता है कि लोहिया जाति व्यवस्था को तोड़ना तो चाहते थे लेकिन संवाद के उन उपकरणों को छोड़ना नहीं चाहते थे जो उन्हें उनकी व्यापक रूप से अनपढ़ जनता से बिजली की कौंध की भांति जोड़ देते थे। वे तुलसीदास के रामचरित मानस का असर जनते थे और यह भी जानते थे कि राम का चरित्र भारत ही नहीं पूरे दक्षिण एशिया के जीवन में रचा बसा है। इसलिए संवाद, संप्रेषण और आदर्शों की स्थापना के लिए इस मिथक का इस्तेमाल करते रहना जरूरी है, क्योंकि यह इतिहास से भी ज्यादा ताकतवर है। लेकिन लोहिया के संपूर्ण विमर्श में एक बात स्पष्ट है कि वे राम को कहीं भी इतिहास पुरुष बनाने का प्रयास नहीं कर रहे हैं। वे राम को एक मिथकीय आदर्श बनाए रख कर अपने लोगों में नैतिकता और आदर्श भरना चाहते थे। इसलिए हम एक बात निश्चिंतता के साथ कह सकते हैं कि अगर संघ परिवार के अयोध्या आंदोलन के दौरान डॉ. राममनोहर लोहिया होते तो वे राम को उनके चंगुल से मुक्त कराने में काफी सार्थक सिद्ध होते। चूंकि डॉ. लोहिया का असमय निधन हुआ था, इसलिए उनके लिए बीस-पच्चीस वर्षो की अतिरिक्त आयु पाना कोई चमत्कारिक कल्पना नहीं है। यह महज संयोग नहीं है कि हिंदुत्व के राममंदिर आंदोलन पर कैफी आजमी से लेकर प्रभाष जोशी जिसने भी कठोर और मर्म पर चुभने वाला प्रहार किया वह राम की मर्यादा की आड़ लेकर ही किया। कैफी साहब ने ‘राम का दूसरा वनवास’ और प्रभाष जोशी ने ‘हिंदू होने का धर्म’ लिखकर डॉ. लोहिया का हिंदू बनाम हिंदू का विमर्श ही चलाया।
दूसरा अहम सवाल यह जानना है कि डॉ. लोहिया किस बात से सबसे ज्यादा व्यथित थे? डॉ. लोहिया के व्याख्यानों को गौर से देखें तो साफ लगता है कि वे इस बात से सबसे ज्यादा बेचैन थे कि भारत गुलाम क्यों हुआ? वह बार-बार लूटा क्यों गया? उसे बाहर से आने वालों ने बार-बार क्यों रौंदा? यह उनकी चिंता का मूल प्रश्न था। वे लगातार इसके कारणों की खोज करते हैं। पर वे उनकी खोज बाहर नहीं भीतर ज्यादा करते हैं। इस मामले में वे गांधी के करीब हैं। गांधी मानते थे कि हम कहीं भी कायर और कमजोर नहीं थे। लेकिन हमें लालच ने घेर लिया इसलिए अंग्रेज हमें गुलाम बना ले गए। डॉ. लोहिया यहां उनसे थोड़े अलग हैं। वे इसके मूर्त और अमूर्त दोनों कारणों को भारतीय समाज के भीतर ही देखने की कोशिश करते हैं। वे मानते हैं कि भारत की जाति व्यवस्था और औरतों को गुलाम बनाने वाले समाज ने हमें भीतर से कमजोर कर दिया इसलिए हम गुलाम बनाए जा सके। एक तरफ हमारे धर्म दर्शन ने बहुत ऊंची-ऊंची बातें कीं और दूसरी तरफ या तो समाज को उपेक्षित छोड़ दिया या उसमें ऐसी निम्न स्तरीय व्यवस्था बना दी जो इंसान को इंसान मानने को तैयार ही नहीं थी। भारत और यूरोपीय दिमाग के दार्शनिक अंतर और भारत के पाखंड को वे कुछ इस तरह व्यक्त करते हैं:-‘‘यूरोपीय दिमाग ने विचार और व्यवहार की रिक्ति को अस्वीकार किया है और वास्तव में इसे सिद्धांत के छद्म आवरण में छुपाया है। लेकिन भारतीय दिमाग अलग तरह का है। इस अंतर को समझने की प्रक्रिया में उसने आदर्श और यथार्थ के बीच पूर्ण संबंध विच्छेद माना है। शंकराचार्य भारतीय दिमाग का सही प्रतिनिधित्व करते हैं। मन की उड़ान से उन्होंने लौकिक और पारलौकिक सत्य को जुदा कर दिया है। इस प्रकार आदमी के दिमाग को इस तरह बना दिया है कि वह न केवल आदमी और पत्थर में भेद करता है, बल्कि जातिभेद भी करता है और बना रहता है अद्वैतवादी। उसने भारतीय दिमाग को यथार्थ से आदर्श को अलग करने की क्षमता दे दी।’’

इस अंतर को वे संक्षेप में इस तरह व्यक्त करते हैं:- ‘‘यूरोपीय दिमाग ने आदर्श और यथार्थ की पूर्ण एकता मान ली है, जबकि भारतीय दिमाग ने दोनों के बीच पूर्ण विच्छेद मान लिया है। यही मानव सोच का वर्तमान संकट है।’’
डॉ. लोहिया इस संकट का समाधान ढूंढने में लगे थे। लेकिन उनका जोर भारत पर था। वे मानते थे कि भारत अपने इसी दिमाग और जाति और यौन (कास्ट एंड जेंडर) संबंधी भेदभाव के कारण गुलाम हुआ है, इसलिए जितनी जल्दी हो सके इन कारणों को मिटाया जाए। ताकि भारत न सिर्फ मजबूत होकर उभरे बल्कि फिर कभी गुलाम न हो। इसलिए उनके जैसा तर्कना बुद्धि वाला व्यक्ति भी कई बार उन अंधविश्वासी बयानों को स्वीकार कर लेता है, जिनसे समाज को गुलाम बनाने वाली बीमारियां दूर होती हैं। उन्हें बिहार में आए भूकम्प के बाद महात्मा गांधी के उस बयान को स्वीकार करने में कोई दिक्कत नहीं हुई, जिसमें उन्होंने कहा था कि यह भूकम्प वहां के समाज में व्याप्त छुआछूत के कारण आया है। वे नारी आदर्शों के बारे में हिंदी इलाकों में बनी रूढ़ियों को तोड़ना चाहते थे इसीलिए उन्होंने सावित्री या द्रौपदी का विमर्श छेड़ा। इन मिथकों की और भी तरीके से व्याख्या की जा सकती है और सावित्री में तमाम गुणों को ढूंढा जा सकता है और द्रौपदी में तमाम कमियां निकाली जा सकती हैं। लेकिन वे जिस समय भारतीय और विशेषकर हिंदी समाज से संवाद कर रहे थे वह उस समय ज्यादा शिक्षित तो क्या पर्याप्त साक्षर भी नहीं था। वहां की महिलाओं को सीता और सावित्री का आदर्श घुट्टी में पिलाया गया था। वहां रामायण तो अखंड पाठ के रूप में स्वीकृत था लेकिन महाभारत को घर में रखने और पढ़ने को अशुभ माना जाता था। कहा जाता था कि अगर महाभारत का पाठ घर में किया जाएगा तो जरूर विग्रह हो जाएगा। ऐसे में द्रौपदी को आदर्श बताकर डॉ. लोहिया ने क्रांतिकारी स्थापना दी । उनकी इस स्थापना का महत्व इस बात से भी लिया जा सकता है कि आज भी किसी खुली सभा में कोई राजनेता इस तरह की बहस नहीं चला सकता।
डॉ. लोहिया के धार्मिक और मिथकीय विमर्शों का तीसरा उद्देश्य भारत की एकता के हर संभव सूत्र तलाशना और उसे मजबूत करना था। यह खंडन-मंडन से अलग उनका सकारात्मक प्रयास था। उनके मन पर भारतीय गुलामी का ही आघात नहीं था बल्कि भारत के विभाजन का भी गहरा घाव था। वे उसे मिटाने के लिए भारत और पाक महासंघ बनाने का राजनीति कार्यक्रम प्रस्तुत करते रहते थे। लेकिन उन्हें उत्तर-दक्षिण, पूरब और पश्चिम में भी टकराव और विभाजन का डर घेरे हुए था। वे अपने समय में दक्षिण का द्रविड़ आंदोलन देख ही रहे थे और नगाओं की नाराजगी का अहसास भी कर रहे थे। उन्होंने नेफा पर चीन का हमला देखा था और कश्मीर की समस्या से परिचित थे ही। ऐसे में वे कभी नेफा को उर्वशीयम बताते हुए उसे अपना अंग बताते थे तो कभी राम, कृष्ण और शिव के माध्यम से पूरब-पश्चिम और उत्तर-दक्षिण को जोड़ते थे। इसी सिलसिले में वे कहते हैं :- ‘‘कैलाश से मानसरोवर तक दोनों बाजुओं के पार देश प्राय: एक ही रहा है। तथा और किसी से बढ़कर धर्म ने उसे एक किया है, किंतु इस धर्म में निस्संदेह कोई कमी जरूर है जिसने कभी-कभी इस एकता को शिथिल बनाया और उसकी आजादी छीन ली। ….’’
इससे आगे वे हिंदू धर्म में एकता के गुणों का बखान करते हुए कहते हैं,‘‘ हिंदू धर्म कम से कम अपने भक्ति रूप में उत्तर-दक्षिण एकता के एक, दूसरे पूरब-पश्चिम एकता के और तीसरे, विशेषत: अपनी पत्नी के द्वारा चौतरफा एकता के देवता का बहुत बढ़िया किस्सा है।’’ भारत की भौगोलिक और सांस्कृतिक एकता के इन किस्सों को डॉ. लोहिया राष्ट्रनिर्माण के उद्देश्य से राजनीतिक अर्थ देते हैं। कृष्ण का द्वारका में बसना ही नहीं इम्फाल से रुक्मिणी को ब्याहना भी एकता का एक प्रतीक है। राम का वनवास के लिए दक्षिण में जाना और सीता को मुक्त कराने के लिए कोल, भील, किरात, वनवासियों और वानर-भालुओं की सेना बनाना भी एकता कायम करने वाला ही मिथक है। शिव के बारे में तो कहा ही जाता है कि वे तो दक्षिण से कैलाश पर्वत पर जाकर ससुराल में ही बस गए। शिव के मिथक की उनकी व्याख्या कई बार असाधारण आयाम छू लेती है। वे कहते हैं कि शिव का हर कर्म स्वतंत्र है। वे किसी भी तरह से कार्य-कारण के सिद्धांत से नहीं बंधे नहीं है। एक प्रसंग में ब्रह्मा और महेश के झगड़े को निपटाते हुए शिव उनमें से एक से कहते हैं कि जाओ मेरी जटाओं को अंतिम छोर पता करो तो दूसरे से कहते हैं कि जाओ मेरे पैरों का विस्तार ढूंढो। इस प्रयास में दोनों थक-हार कर लौट आते हैं और विवाद धरा का धरा रह जाता है। इसी तरह एक और प्रसंग में एक नृत्य प्रतियोगिता में पार्वती शिव को बार-बार पराजित करती हैं। लेकिन अंत में शिव अपना पैर थोड़ी अशोभनीय मुद्रा में उठा देते हैं जिसका मुकाबला पार्वती नहीं कर पातीं और शिव जीत जाते हैं। स्त्री-पुरुष प्रतिस्पर्धा की यह कथा पौराणिक युग की तरह आज भी बेहद मानवीय और लोकजीवन के करीब है। कृष्ण के मिथक को महात्मा गांधी से जोड़ते हुए शिव कहते हैं कि एक का जन्म यमुना नदी के किनारे हुआ और उसका निधन काठियावाड़ में साबरमती के पास हुआ तो दूसरे का जन्म काठियावाड़ इलाके में हुआ पर उनकी मृत्यु (या हत्या) यमुना नदी के किनारे हुई।
मिथकों से एकता कायम करने और उनसे खेलने का उनका उद्देश्य तब और स्पष्ट हो जाता है जब वे रामायण मेले के उद्देश्य को स्पष्ट करते हैं। उनका कहना है कि उनके रामायण मेले का उद्देश्य है:-आनंद, दृष्टि, रस संसार और हिंदुस्तान को बढ़ावा।
एकता के इसी मूल भावना के वशीभूत होकर अवधूत लोहिया जब अनहद पर जाकर विहंगम दृष्टि डालते हैं तो उन्हें धर्म और राजनीति के मूल तत्व में कोई फर्क नहीं नजर आता। दरअसल दोनों ही मानवीय विचार और कर्म हैं फर्क उनके दायरे का है। उनका यह कथन अच्छे या बुरे दोनों अर्थों में बार-बार प्रमाणित होता है कि ‘‘ धर्म मुझे प्राय: दीर्घकालिक राजनीति के अलावा कुछ और प्रतीत नहीं हुआ है, निरंतर राजनीति। उसी तरह से राजनीति मुझे अल्पकालिक धर्म लगता है, प्रवाहमान धर्म। धर्म के संस्थापक ईसा और मोहम्मद जैसे लोग हुए हैं। जिनके राजनीतिक लक्ष्य थे।’’

आज अगर सैमुअल हंटिग्टन के सभ्यताओं के संघर्ष के सिद्धांत पर काम करने वाले अमेरिकी राज्य और उसी की तर्ज पर प्रतिक्रिया जता रहे अरब देशों पर नजर डालें तो साफ लगता है कि लोहिया की स्थापना में एक वैज्ञानिक दृष्टि है। पर उन्होंने अगर धर्म की परमाणु ऊर्जा को शांति के उद्देश्य से ढूंढा था तो उसका उपयोग एटम बम के लिए हो रहा है। यहां फिर इस बात का उल्लेख जरूरी है कि डॉ. लोहिया एक राजनेता थे और वे मिथक, धर्म और संस्कृति और अर्थशास्त्री सभी का उपयोग मानव कल्याण के लिए करना चाहते थे। वे चाहते थे कि- शक्ति के विद्युत कण जो व्यस्त विकल बिखरे हैं, हों निरुपाय। समन्वय उनका करें समस्त विजयनी मानवता हो जाए।
लेकिन यहां फिर गांधी की वह चेतावनी दोहराई जानी चाहिए कि सत्याग्रह का उपयोग सभी को नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार राजनीति के लिए धर्म और मिथक का उपयोग सभी को नहीं करने देना चाहिए। वह एंटीबायोटिक की तरह से है। अगर उसका नुस्खा डॉ. राममनोहर लोहिया जैसा कोई सुयोग्य डॉक्टर लिखेगा तो उससे मरीज को फायदा होगा। लेकिन अगर कोई नीम-हकीम उसका इस्तेमाल करेगा तो समाज में प्रतिक्रिया होगी और उसमें विकार उत्पन्न होगा।
(प्रस्तुत निबंध साहित्य अकादेमी की तरफ से डॉ. राममनोहर लोहिया की जन्मशती के मौके पर 18-20 फरवरी के बीच आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में एक परचे के तौर पर पढ़ा गया।


स्वयं में एक मिथक थे डॉ. लोहिया

राम मनोहर लोहिया इतिहास भी हैं और मिथक भी। वे राजनीतिज्ञ भी हैं और धर्मगुरु भी। वे दार्शनिक भी हैं और राजनीतिक कार्यकर्ता भी। सचमुच आज के समाजवादी नेताओं को देखकर यकीन नहीं होता कि उनके आंदोलन में कभी इतनी विलक्षण प्रतिभा रही होगी। जिस तरह वे राम, कृष्ण और शिव को भारतीय पूर्णता का स्वप्न मानते हैं उसी तरह उनको भी भारतीय समाजवाद का स्वप्न माना जा सकता है।

कभी लगता है कि वे भारतीय राजनीति के नचिकेता हैं और अपने प्रश्नों से अपने पिता तुल्य राजनेताओं को उसी तरह व्यथित कर देते हैं जैसे नचिकेता ने अपने पिता वाजश्रवा को किया था। इससे यह भी लगता है कि उनके पास यमराज के पास जाने के अलावा कोई चारा नहीं हैं। लेकिन धर्म, संस्कृति और मिथकों पर सवालों से इतर अपनी व्याख्याओं से जिस तरह वे जनता को साराबोर कर उसे बदलने के लिए प्रेरित करते हैं उससे यह भी लगता है कि उनमें वाजश्रवा के पास लौटने की भी क्षमता है। डॉ. लोहिया अपने विमर्श, अपने कर्म और अपने प्रेम से शिव, राम और कृष्ण के मिलेजुले रूप लगते हैं। उनका यही रूप आगे के किसी समाजवादी आंदोलन को प्रेरित करेगा।
सवाल उठता है कि डॉ. राममनोहर लोहिया जैसे समाजवादी और नास्तिक राजनेता ने मिथक, धर्म और संस्कृति पर इतना समय और दिमाग क्यों खर्च किया? इससे समाज को फायदा हुआ या नुकसान? क्या उनके इसी झुकाव का परिणाम है हिंदी इलाके में हिंदुत्व की राजनीति का उदय? क्या इसीलिए संघ परिवार उन्हें अपने करीब पाता है और कहता रहता है कि उनकी आर्थिक नीतियां कम्युनिस्टों और सांस्कृतिक नीतियां संघ के करीब हैं? या फिर उनके विमर्शों को न समझ पाने के कारण हिंदी इलाके और विशेष तौर पर उनके जन्म क्षेत्र अवध में सांप्रदायिक झंझावात आया जिसके चलते बाबरी मस्जिद को तोड़े जाने का धतकरम किया गया? हिंदुत्ववादियों और डॉ. लोहिया के मिथक मंथन के उद्देश्य बिल्कुल अलग रहे हैं। एक का उद्देश्य सामाजिक कलुष पैदा करना तो दूसरे का उद्देश्य सामाजिक समता और प्रेम पैदा करना रहा है। डॉ. लोहिया मिथकों पर इतना जोर क्यों देते हैं और वे उसमें इतना रस क्यों लेते हैं? दरअसल वे यह बात बार-बार कहते हैं कि पिछले डेढ़ हजार साल में भारतीय इतिहास में न तो कोई बगावत हुई और न ही कोई बड़ा नायक पैदा हुआ। बल्कि इतिहास के इस दौर में भारत में अपने राज्य की अनुपस्थिति भी रही। जब मुगल शासकों के अंतिम दौर में उनका राज्य भारतीय जनता से तादात्म्य स्थापित करने लगा तो अचानक अंग्रेजों की पराया राज्य कायम हो गया। लोहिया के सामने इतिहास छोड़कर मिथक अपनाने के पीछे महज यही कारण नहीं है कि भारतीय इतिहास से ज्यादा मिथक पर जोर देते हैं। वे वास्तव में भारत के लंबे समय से पराजित इतिहास से व्यथित हैं। उन्हें अलीगढ़ स्कूल के इतिहासकारों से लेकर डॉ. ताराचंद और आरसी मजूमदार से इस बात की शिकायत है कि उन्होंने ठीक तरह से इतिहास नहीं लिखा। इतिहास की इस अंधेरी कोठरी से भयभीत डॉ. लोहिया हिंदू धर्म के मिथकों और प्रतीकों में रोशनी और ऊर्जा ढूंढते हैं। यानी इतिहास से निराश लोहिया मिथक और धर्म की तरफ भागते हैं। इस दौरान वे अपने समाजवाद की एक सांस्कृतिक योजना प्रस्तुत करते हैं।
डॉ. लोहिया की बातों को समझने के लिए हमें उनके समय और उद्देश्य पर गौर करना होगा। हमें डॉ. लोहिया के विचारों को समझने के लिए जिन तीन बातों पर विशेष तौर पर ध्यान देना होगा वे हैं :-(1) वे मूलत: कहां के थे? (2)-वे किस बात से सर्वाधिक व्यथित थे? (3)-वे करना क्या चाहते थे?
डॉ. लोहिया का जन्म फैजाबाद जिले(आज के अकबरपुर) में हुआ था जो अवध की राजधानी रहा है और जिसके जुड़वां शहर अयोध्या में राम के जन्म का मिथक लोकआस्था में गहराई से बैठा है। जाहिर है लोहिया को रामराज्य के आदर्श को महात्मा गांधी या किसी और बड़े नेता से सीखने की जरूरत नहीं थी। अवध के कण-कण में राम नाम गूंजता है और वह डॉ. लोहिया में आखिर तक गूंजता रहा। लोहिया पर जर्मनी की पढ़ाई और अमेरिका दौरे की काफी चर्चा होती है, उनकी अखिल भारतीयता भी उनके व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण अंग रही है। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि वे मूलत: अवध के थे। लोहिया के संपूर्ण विमर्श में स्थानीयता का विशेष महत्व रहा है। इसीलिए वे कहते भी हैं कि विश्ववाद की जुबान स्थानीय ही होगी। राम के चरित्र में तमाम कमियां हैं इस बात को लोहिया स्वीकार भी करते हैं फिर भी वे राम को छोड़ने को तैयार नहीं हैं। बालि को छल से मारना, सीता की अग्निपरीक्षा, सीता का वनवास और फिर शंबूक का वध यह सब ऐसे प्रसंग है जिनके कारण अगर लोहिया चाहते तो राम को अपने विमर्श में उसी तरह हाशिए पर फेंक सकते थे जिस तरह वे सीता, सावित्री और वशिष्ठ को दरकिनार करते हैं। लेकिन राम की कमियां जानते हुए भी वे उन्हें अस्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। जाति और यौन(कास्ट एंड जेंडर) के कटघरे तोड़ने के उनके अभियान में राम कहीं आड़े नहीं आते। जबकि उनसे पहले जाति को समूल नाश करने का अभियान चलाने वाले डॉ. अंबेडकर ‘रिडल्स इन हिंदुइज्म’ में राम को सीधे निशाने पर ले चुके थे। इसी के साथ यह भी सच है कि डॉ. लोहिया अंबेडकर से राजनीतिक गठजोड़ भी बनाने के प्रयास में जुटे थे। इससे यह भी लगता है कि लोहिया जाति व्यवस्था को तोड़ना तो चाहते थे लेकिन संवाद के उन उपकरणों को छोड़ना नहीं चाहते थे जो उन्हें उनकी व्यापक रूप से अनपढ़ जनता से बिजली की कौंध की भांति जोड़ देते थे। वे तुलसीदास के रामचरित मानस का असर जनते थे और यह भी जानते थे कि राम का चरित्र भारत ही नहीं पूरे दक्षिण एशिया के जीवन में रचा बसा है। इसलिए संवाद, संप्रेषण और आदर्शों की स्थापना के लिए इस मिथक का इस्तेमाल करते रहना जरूरी है, क्योंकि यह इतिहास से भी ज्यादा ताकतवर है। लेकिन लोहिया के संपूर्ण विमर्श में एक बात स्पष्ट है कि वे राम को कहीं भी इतिहास पुरुष बनाने का प्रयास नहीं कर रहे हैं। वे राम को एक मिथकीय आदर्श बनाए रख कर अपने लोगों में नैतिकता और आदर्श भरना चाहते थे। इसलिए हम एक बात निश्चिंतता के साथ कह सकते हैं कि अगर संघ परिवार के अयोध्या आंदोलन के दौरान डॉ. राममनोहर लोहिया होते तो वे राम को उनके चंगुल से मुक्त कराने में काफी सार्थक सिद्ध होते। चूंकि डॉ. लोहिया का असमय निधन हुआ था, इसलिए उनके लिए बीस-पच्चीस वर्षो की अतिरिक्त आयु पाना कोई चमत्कारिक कल्पना नहीं है। यह महज संयोग नहीं है कि हिंदुत्व के राममंदिर आंदोलन पर कैफी आजमी से लेकर प्रभाष जोशी जिसने भी कठोर और मर्म पर चुभने वाला प्रहार किया वह राम की मर्यादा की आड़ लेकर ही किया। कैफी साहब ने ‘राम का दूसरा वनवास’ और प्रभाष जोशी ने ‘हिंदू होने का धर्म’ लिखकर डॉ. लोहिया का हिंदू बनाम हिंदू का विमर्श ही चलाया।
दूसरा अहम सवाल यह जानना है कि डॉ. लोहिया किस बात से सबसे ज्यादा व्यथित थे? डॉ. लोहिया के व्याख्यानों को गौर से देखें तो साफ लगता है कि वे इस बात से सबसे ज्यादा बेचैन थे कि भारत गुलाम क्यों हुआ? वह बार-बार लूटा क्यों गया? उसे बाहर से आने वालों ने बार-बार क्यों रौंदा? यह उनकी चिंता का मूल प्रश्न था। वे लगातार इसके कारणों की खोज करते हैं। पर वे उनकी खोज बाहर नहीं भीतर ज्यादा करते हैं। इस मामले में वे गांधी के करीब हैं। गांधी मानते थे कि हम कहीं भी कायर और कमजोर नहीं थे। लेकिन हमें लालच ने घेर लिया इसलिए अंग्रेज हमें गुलाम बना ले गए। डॉ. लोहिया यहां उनसे थोड़े अलग हैं। वे इसके मूर्त और अमूर्त दोनों कारणों को भारतीय समाज के भीतर ही देखने की कोशिश करते हैं। वे मानते हैं कि भारत की जाति व्यवस्था और औरतों को गुलाम बनाने वाले समाज ने हमें भीतर से कमजोर कर दिया इसलिए हम गुलाम बनाए जा सके। एक तरफ हमारे धर्म दर्शन ने बहुत ऊंची-ऊंची बातें कीं और दूसरी तरफ या तो समाज को उपेक्षित छोड़ दिया या उसमें ऐसी निम्न स्तरीय व्यवस्था बना दी जो इंसान को इंसान मानने को तैयार ही नहीं थी। भारत और यूरोपीय दिमाग के दार्शनिक अंतर और भारत के पाखंड को वे कुछ इस तरह व्यक्त करते हैं:-‘‘यूरोपीय दिमाग ने विचार और व्यवहार की रिक्ति को अस्वीकार किया है और वास्तव में इसे सिद्धांत के छद्म आवरण में छुपाया है। लेकिन भारतीय दिमाग अलग तरह का है। इस अंतर को समझने की प्रक्रिया में उसने आदर्श और यथार्थ के बीच पूर्ण संबंध विच्छेद माना है। शंकराचार्य भारतीय दिमाग का सही प्रतिनिधित्व करते हैं। मन की उड़ान से उन्होंने लौकिक और पारलौकिक सत्य को जुदा कर दिया है। इस प्रकार आदमी के दिमाग को इस तरह बना दिया है कि वह न केवल आदमी और पत्थर में भेद करता है, बल्कि जातिभेद भी करता है और बना रहता है अद्वैतवादी। उसने भारतीय दिमाग को यथार्थ से आदर्श को अलग करने की क्षमता दे दी।’’

इस अंतर को वे संक्षेप में इस तरह व्यक्त करते हैं:- ‘‘यूरोपीय दिमाग ने आदर्श और यथार्थ की पूर्ण एकता मान ली है, जबकि भारतीय दिमाग ने दोनों के बीच पूर्ण विच्छेद मान लिया है। यही मानव सोच का वर्तमान संकट है।’’
डॉ. लोहिया इस संकट का समाधान ढूंढने में लगे थे। लेकिन उनका जोर भारत पर था। वे मानते थे कि भारत अपने इसी दिमाग और जाति और यौन (कास्ट एंड जेंडर) संबंधी भेदभाव के कारण गुलाम हुआ है, इसलिए जितनी जल्दी हो सके इन कारणों को मिटाया जाए। ताकि भारत न सिर्फ मजबूत होकर उभरे बल्कि फिर कभी गुलाम न हो। इसलिए उनके जैसा तर्कना बुद्धि वाला व्यक्ति भी कई बार उन अंधविश्वासी बयानों को स्वीकार कर लेता है, जिनसे समाज को गुलाम बनाने वाली बीमारियां दूर होती हैं। उन्हें बिहार में आए भूकम्प के बाद महात्मा गांधी के उस बयान को स्वीकार करने में कोई दिक्कत नहीं हुई, जिसमें उन्होंने कहा था कि यह भूकम्प वहां के समाज में व्याप्त छुआछूत के कारण आया है। वे नारी आदर्शों के बारे में हिंदी इलाकों में बनी रूढ़ियों को तोड़ना चाहते थे इसीलिए उन्होंने सावित्री या द्रौपदी का विमर्श छेड़ा। इन मिथकों की और भी तरीके से व्याख्या की जा सकती है और सावित्री में तमाम गुणों को ढूंढा जा सकता है और द्रौपदी में तमाम कमियां निकाली जा सकती हैं। लेकिन वे जिस समय भारतीय और विशेषकर हिंदी समाज से संवाद कर रहे थे वह उस समय ज्यादा शिक्षित तो क्या पर्याप्त साक्षर भी नहीं था। वहां की महिलाओं को सीता और सावित्री का आदर्श घुट्टी में पिलाया गया था। वहां रामायण तो अखंड पाठ के रूप में स्वीकृत था लेकिन महाभारत को घर में रखने और पढ़ने को अशुभ माना जाता था। कहा जाता था कि अगर महाभारत का पाठ घर में किया जाएगा तो जरूर विग्रह हो जाएगा। ऐसे में द्रौपदी को आदर्श बताकर डॉ. लोहिया ने क्रांतिकारी स्थापना दी । उनकी इस स्थापना का महत्व इस बात से भी लिया जा सकता है कि आज भी किसी खुली सभा में कोई राजनेता इस तरह की बहस नहीं चला सकता।
डॉ. लोहिया के धार्मिक और मिथकीय विमर्शों का तीसरा उद्देश्य भारत की एकता के हर संभव सूत्र तलाशना और उसे मजबूत करना था। यह खंडन-मंडन से अलग उनका सकारात्मक प्रयास था। उनके मन पर भारतीय गुलामी का ही आघात नहीं था बल्कि भारत के विभाजन का भी गहरा घाव था। वे उसे मिटाने के लिए भारत और पाक महासंघ बनाने का राजनीति कार्यक्रम प्रस्तुत करते रहते थे। लेकिन उन्हें उत्तर-दक्षिण, पूरब और पश्चिम में भी टकराव और विभाजन का डर घेरे हुए था। वे अपने समय में दक्षिण का द्रविड़ आंदोलन देख ही रहे थे और नगाओं की नाराजगी का अहसास भी कर रहे थे। उन्होंने नेफा पर चीन का हमला देखा था और कश्मीर की समस्या से परिचित थे ही। ऐसे में वे कभी नेफा को उर्वशीयम बताते हुए उसे अपना अंग बताते थे तो कभी राम, कृष्ण और शिव के माध्यम से पूरब-पश्चिम और उत्तर-दक्षिण को जोड़ते थे। इसी सिलसिले में वे कहते हैं :- ‘‘कैलाश से मानसरोवर तक दोनों बाजुओं के पार देश प्राय: एक ही रहा है। तथा और किसी से बढ़कर धर्म ने उसे एक किया है, किंतु इस धर्म में निस्संदेह कोई कमी जरूर है जिसने कभी-कभी इस एकता को शिथिल बनाया और उसकी आजादी छीन ली। ….’’
इससे आगे वे हिंदू धर्म में एकता के गुणों का बखान करते हुए कहते हैं,‘‘ हिंदू धर्म कम से कम अपने भक्ति रूप में उत्तर-दक्षिण एकता के एक, दूसरे पूरब-पश्चिम एकता के और तीसरे, विशेषत: अपनी पत्नी के द्वारा चौतरफा एकता के देवता का बहुत बढ़िया किस्सा है।’’ भारत की भौगोलिक और सांस्कृतिक एकता के इन किस्सों को डॉ. लोहिया राष्ट्रनिर्माण के उद्देश्य से राजनीतिक अर्थ देते हैं। कृष्ण का द्वारका में बसना ही नहीं इम्फाल से रुक्मिणी को ब्याहना भी एकता का एक प्रतीक है। राम का वनवास के लिए दक्षिण में जाना और सीता को मुक्त कराने के लिए कोल, भील, किरात, वनवासियों और वानर-भालुओं की सेना बनाना भी एकता कायम करने वाला ही मिथक है। शिव के बारे में तो कहा ही जाता है कि वे तो दक्षिण से कैलाश पर्वत पर जाकर ससुराल में ही बस गए। शिव के मिथक की उनकी व्याख्या कई बार असाधारण आयाम छू लेती है। वे कहते हैं कि शिव का हर कर्म स्वतंत्र है। वे किसी भी तरह से कार्य-कारण के सिद्धांत से नहीं बंधे नहीं है। एक प्रसंग में ब्रह्मा और महेश के झगड़े को निपटाते हुए शिव उनमें से एक से कहते हैं कि जाओ मेरी जटाओं को अंतिम छोर पता करो तो दूसरे से कहते हैं कि जाओ मेरे पैरों का विस्तार ढूंढो। इस प्रयास में दोनों थक-हार कर लौट आते हैं और विवाद धरा का धरा रह जाता है। इसी तरह एक और प्रसंग में एक नृत्य प्रतियोगिता में पार्वती शिव को बार-बार पराजित करती हैं। लेकिन अंत में शिव अपना पैर थोड़ी अशोभनीय मुद्रा में उठा देते हैं जिसका मुकाबला पार्वती नहीं कर पातीं और शिव जीत जाते हैं। स्त्री-पुरुष प्रतिस्पर्धा की यह कथा पौराणिक युग की तरह आज भी बेहद मानवीय और लोकजीवन के करीब है। कृष्ण के मिथक को महात्मा गांधी से जोड़ते हुए शिव कहते हैं कि एक का जन्म यमुना नदी के किनारे हुआ और उसका निधन काठियावाड़ में साबरमती के पास हुआ तो दूसरे का जन्म काठियावाड़ इलाके में हुआ पर उनकी मृत्यु (या हत्या) यमुना नदी के किनारे हुई।
मिथकों से एकता कायम करने और उनसे खेलने का उनका उद्देश्य तब और स्पष्ट हो जाता है जब वे रामायण मेले के उद्देश्य को स्पष्ट करते हैं। उनका कहना है कि उनके रामायण मेले का उद्देश्य है:-आनंद, दृष्टि, रस संसार और हिंदुस्तान को बढ़ावा।
एकता के इसी मूल भावना के वशीभूत होकर अवधूत लोहिया जब अनहद पर जाकर विहंगम दृष्टि डालते हैं तो उन्हें धर्म और राजनीति के मूल तत्व में कोई फर्क नहीं नजर आता। दरअसल दोनों ही मानवीय विचार और कर्म हैं फर्क उनके दायरे का है। उनका यह कथन अच्छे या बुरे दोनों अर्थों में बार-बार प्रमाणित होता है कि ‘‘ धर्म मुझे प्राय: दीर्घकालिक राजनीति के अलावा कुछ और प्रतीत नहीं हुआ है, निरंतर राजनीति। उसी तरह से राजनीति मुझे अल्पकालिक धर्म लगता है, प्रवाहमान धर्म। धर्म के संस्थापक ईसा और मोहम्मद जैसे लोग हुए हैं। जिनके राजनीतिक लक्ष्य थे।’’

आज अगर सैमुअल हंटिग्टन के सभ्यताओं के संघर्ष के सिद्धांत पर काम करने वाले अमेरिकी राज्य और उसी की तर्ज पर प्रतिक्रिया जता रहे अरब देशों पर नजर डालें तो साफ लगता है कि लोहिया की स्थापना में एक वैज्ञानिक दृष्टि है। पर उन्होंने अगर धर्म की परमाणु ऊर्जा को शांति के उद्देश्य से ढूंढा था तो उसका उपयोग एटम बम के लिए हो रहा है। यहां फिर इस बात का उल्लेख जरूरी है कि डॉ. लोहिया एक राजनेता थे और वे मिथक, धर्म और संस्कृति और अर्थशास्त्री सभी का उपयोग मानव कल्याण के लिए करना चाहते थे। वे चाहते थे कि- शक्ति के विद्युत कण जो व्यस्त विकल बिखरे हैं, हों निरुपाय। समन्वय उनका करें समस्त विजयनी मानवता हो जाए।
लेकिन यहां फिर गांधी की वह चेतावनी दोहराई जानी चाहिए कि सत्याग्रह का उपयोग सभी को नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार राजनीति के लिए धर्म और मिथक का उपयोग सभी को नहीं करने देना चाहिए। वह एंटीबायोटिक की तरह से है। अगर उसका नुस्खा डॉ. राममनोहर लोहिया जैसा कोई सुयोग्य डॉक्टर लिखेगा तो उससे मरीज को फायदा होगा। लेकिन अगर कोई नीम-हकीम उसका इस्तेमाल करेगा तो समाज में प्रतिक्रिया होगी और उसमें विकार उत्पन्न होगा।
(प्रस्तुत निबंध साहित्य अकादेमी की तरफ से डॉ. राममनोहर लोहिया की जन्मशती के मौके पर 18-20 फरवरी के बीच आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में एक परचे के तौर पर पढ़ा गया।


मंदिर मस्जिद मुद्दे पर आपसी बातचीत से हल निकलने के आसार !!

अयोध्या में मंदिर मस्जिद विवाद से जुड़े तीनों मुख्य पक्षों रामजन्म भूमि ट्रस्ट, हाशिम अंसारी तथा निर्मोही अखाड़ा के बीच शुक्रवार को यहां पहली बार लगभग डेढ़ घंटे तक हुई आपसी बातचीत के बाद दावा किया गया कि मन्दिर-मस्जिद विवादास्पद मुद्दे को आपसी सहमति से हल करने का फॉर्मूला निकाल लिया गया है।

हनुमानगढ़ी के महंत ज्ञानदास के आवास पर शुक्रवार शाम निर्मोही अखाड़े के महंत रामदास, राम जन्मभूमि न्यास के सदस्य रामविलास वेदान्ती तथा हाशिम अंसारी तीनों पक्षों की लगभग डेढ़ घंटे तक हुई आपसी बातचीत के बाद कहा गया कि इस विवादास्पद मन्दिर-मस्जिद मुद्दे का ऐसा फॉर्मूला निकाल लिया गया है जो हिन्दू-मुस्लिम दोनों पक्षों को स्वीकार्य हो।
महंत ज्ञानदास ने अपने आवास पर हुई बैठक के बाद बताया कि शुक्रवार को पहली बार तीनों पक्षों के बीच हुई बातचीत में हम लोगों ने ऐसा प्रयास किया है कि मन्दिर-मस्जिद दोनों की भावनाओं को ध्यान में रखने के साथ-साथ न्यायालय का भी सम्मान करते हुए हमने इस मुद्दे का समाधान हो जाए। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि वे अभी इस फॉर्मूले का खुलासा नहीं करेंगे।
उन्होंने कहा कि हम ऐसा फॉर्मूला सामने लाना चाहते हैं जिसके चलते हिन्दू मस्जिद निर्माण में कारसेवा करें और मुसलमान राम मन्दिर निर्माण की कारसेवा में लगें।
दास ने कहा कि हाशिम भाई ने मन्दिर-मस्जिद विवाद का सर्वमान्य हल निकाले जाने की जिम्मेदारी मुझे सौंपी थी, शुक्रवार को हम तीनों पक्षकारों को एक साथ एक स्थान पर ले आए हैं और उम्मीद है कि दशकों पुराने इस विवाद का सर्वस्वीकार्य हल भी निकल आयेगा। उन्होंने कहा कि शुक्रवार को तीनों पक्षों की बैठक हनुमानगढ़ी स्थित मेरे उस आवास पर हुई है जहां इसी स्थान पर रोजा हुआ था और यह मुद्दा भी इसी स्थान पर निपट जायेगा।
हाशिम अंसारी ने महंत ज्ञानदास की बात पर सहमति जताते हुए कहा कि मन्दिर-मस्जिद विवाद के सर्वमान्य फॉर्मूले में यदि किसी प्रकार की कमी रह जायेगी और इस बीच कोई भी पक्ष सुप्रीम कोर्ट चला जायेगा तब भी आपसी बातचीत के जरिये हल के प्रयास चलते रहेंगे। अंसारी ने कहा कि मन्दिर-मस्जिद मुद्दे को लेकर बहुत राजनीति हो चुकी अब इस पर राजनीति करने वालों को अपने बीच नहीं आने देंगे। निर्मोही अखाड़े के महंत एवं पंच रामदास ने शुक्रवार को हुई बैठक के बाद कहा कि आज की मुलाकात रंग ला रही है और जो प्रारूप निकाला गया है, उससे हिन्दू-मुस्लिम दोनों पक्षों को कोई आपत्ति नहीं होगी।

निर्मोही अखाड़े के महंत ने कहा कि बहुत खून-खराबा हो गया अब शांति और अमन की बात करनी है और जो फॉर्मूला निकाला गया है, वह शांति-संदेश के रूप में जाना जायेगा। साथ ही साथ उन्होंने राजनैतिक लोगों से कहा कि अब मन्दिर-मस्जिद मुद्दे को लेकर बयानबाजी बंद करें।

राम-जन्मभूमि न्यास के वरिष्ठ सदस्य रामविलास वेदान्ती ने कहा कि मैं आज पहली बार हाशिम अंसारी साहब से मिला हूं और आज हुई बैठक में उनके विचार और बातें सुनकर बहुत प्रसन्नता हुई। वेदान्ती ने कहा कि हनुमानगढ़ी के महंत ज्ञानदास ने मन्दिर-मस्जिद मुद्दे को लेकर जो पहल की है, उससे पूरे देश में हिन्दू और मुसलमानों के बीच खाई पटेगी और कहा कि कुछ राजनैतिक दल षडयंत्र रच रहे हैं मगर उनके मनसूबे सफल नहीं होंगे।
अखिल भारत हिन्दू महासभा तथा सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड पहले ही यह घोषणा कर चुके हैं कि वे हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट जायेंगे। यह पहला अवसर है कि विवादास्पद स्थल से जुड़े तीनों प्रमुख पक्ष के लोग आज पहली बार एक स्थान पर बैठे और इस मुद्दे का सर्वमान्य हल ढूंढ़ने के पक्ष में विचार-विमर्श की पहल शुरू की है।

बिहार चुनाव

बीच भवंर में छोड़ा दिया पार्टी की नैया ठाकुर ने ,
बीजेपी के साथ किया क्या देखो भैया ठाकुर ने .
पुत्र मोह में छोड़ दिया अनुशासन और नैतिकता ,
लोकतंत्र की नयी राह पर लोभ मोह ही टिकता .
कहे बिहारी बेबस होके आपस की दूरी पाटो,
बीबी बच्चे बहु बेटे में पार्टी की टिकट बाँटो

suno bihari: लोहिया की लड़ाई का रास्ता: रघु ठाकुर

suno bihari: लोहिया की लड़ाई का रास्ता: रघु ठाकुर

लोहिया की लड़ाई का रास्ता: रघु ठाकुर

डा राम मनोहर लोहिया

लोहिया आम आदमी के प्रवक्ता थे. वे आम व खास का फर्क मिटाना चाहते थे तथा गरीब के मन में विषमता के प्रति आक्रोश पैदा कर उसे बदला
परिवर्तन की लड़ाई के लिये तैयार करना चाहते थे. उनके चिंतन का मूल आधार ही भेदभाव के खिलाफ संघर्ष और संघर्षशील मन तैयार करने का था.
वे सबसे कमजोर व्यक्ति के मन में सिविल नाफरमानी या सविनय अवज्ञा



के अहिंसक हथियारों के प्रति विश्वास तथा इनके प्रयोग के लिये

आदत


बनाना





चाहते थे.

लोहिया समग्र परिवर्तन में विश्वास रखते थे. उनके ही शब्दों में '' हिन्दुस्तान की सामान्य जनता, मामूली लोग अपने में भरोसा करना शुरू करें कि कल तक जो अंग्रेजी राज था, वह पाजी बन गया तो उसे खत्म किया. आज कांग्रेसी सरकार है वह पाजी बन गई तो उसे खत्म करेंगे. कल मान लो कम्यूनिस्ट सरकार बने व पाजी बन जाये तो उसे भी खत्म करेंगे. परसों सोशलिस्ट सरकार बनेगी, मान लो वह भी पाजी बन जाये तो उसे भी खत्म करेंगे. जिस तरह तवे पर रोटी उलटते-पलटते सेंक लेते हैं, उसी तरह हिन्दुस्तान की सरकार को उलटते-पलटते ईमानदार बनाकर छोड़ेंगे. यह भरोसा किसी तरह हिन्दुस्तान की जनता में आ जाये तो फिर रंग आ जायेगा राजनीति में. ''

लोहिया आम आदमी को लड़ना सिखाकर राजनैतिक परिवर्तन की क्रिया को तेज करना चाहते थे. उनके ही शब्दों में '' बिना हथियारों के अन्याय से लड़ने का तरीका निकालना पड़ेगा. इसका तरीका निकला भी है. सिविल नाफरमानी की क्रिया में न्याय और समता प्राप्त करने की उस मनुष्य की अदम्य प्रवृत्ति प्रकट होती है, जिसके हाथ में हथियार नही है. हथियारों के खात्मे की तरह गरीबी का अंत भी अपने आप नही हो जायेगा. दोनों के लिये लगन के साथ यत्न करना पड़ेगा. हथियार और गरीबी में गरीबी बिलाशक ज्यादा मारक रोग है. ''

लोहिया का हर संघर्ष आम आदमी से जुड़ा हुआ था और आम आदमी का विश्वास जगाने आम और विशेष का फर्क मिटाने, आदमी में आत्म विश्वास और साहस पैदा करने के लिये था. लोहिया बम्बई की यात्रा पर थे और जिस मकान में ठहरे हुए थे, उस मकान के सामने बम्बई की झोपड़ पट्टी के लोग सार्वजनिक नल के सामने लाईन लगाये थे तथा परेशान महिलायें नजर आयीं.

लोहिया ने अपने साथियों से सवाल पूछा कि उन्हें संगठित कौन करेगा ? एक विचारधारा और पार्टी का आधार ऐसे संगठन ही हो सकते है. श्रीमती मृणाल गोरे ने यह जबाबदारी स्वीकार की और बम्बई के झोपड़ पट्टी वालों को संगठित करना शुरू किया तथा पानी के लिये परेशान महिलाओं को संगठित कर सड़कों पर निकलना शुरू किया. कुछ ही समय में मृणाल ताई बम्बई की ‘पानी वाली ताई’ बन गई और बम्बई के उन गरीब आम असंगठित लोगों ने लड़ना सीख लिया, जो मायानगरी की माया के डर से घरों से निकलते नही थे.

उ.प्र. में जब तत्कालीन राज्य सरकार ने सिंचाई की दरें बढ़ाई तब लोहिया ने इस दर वृद्धि के खिलाफ किसानों का आंदोलन शुरू कराया, जिसे नहर रेट आंदोलन कहा गया. उसी आंदोलन की अगुवाई के चलते अर्जुनसिंह भदौरिया को कमाण्डर की उपाधि दी गई और इसी आंदोलन का परिणाम था कि मुलायम सिंह यादव जैसे लोग कमाण्डर साहब का झोला उठाकर एक अति गरीब परिवार से निकलकर आज की पहचान हासिल कर सके.

इस किसान आंदोलन में स्वयं डॉ. राममनोहर लोहिया लम्बे समय जेल में रहे और उ.प्र. में सैकड़ों किसानों को राजनैतिक कार्यकर्ता और नेता बना दिया. जन समस्या के साथ-साथ नये नेतृत्व को गढ़ने की उनकी कला अद्भुत थी, जो आम आदमी को स्वत: नेतृत्व की क्षमता का विश्वास लेकर नेता बनाती थी.

जब वे अमरीका की यात्रा पर गये और उन्हे काले होने के कारण होटल में प्रवेश से रोका गया तो उन्होने दिल्ली लौटकर संसद में उठाने का इंतजार नही किया बल्कि वहीं विरोध कर गिरप्तारी दी.देश में आदिवासियों की जमीन के सवाल को आजादी के बाद सबसे पहले लोहिया ने ही उठाया और तत्कालीन रायपुर जिले से 150 किमी दूर के घने जंगल के गाँव उमरादिहान में जमीन पर खेती करने का आंदोलन चलाया. हजारों बेरोजगार आदिवासियों के लिये यह जमीन की ''मांग जमीन'' का आंदोलन बन गया.

रायपुर के सुदुर क्षेत्रों से लेकर बस्तर तक सैकड़ों गाँव के आदिवासी खेती के लिये जमीन की मांग को लेकर संघर्ष के लिये सड़कों पर निकल पड़े. तीन-तीन पीढ़ियाँ उनकी जेलों में जा चुकी है. हजारों लोग जमीन के मालिक बन चुके हैं. वन भूमि अधिकार विधेयक जो सन् 2006 में भारतीय संसद में पारित हुआ, उसका वास्तविक बीज लोहिया ने ही डाला था.

बस्तर में जब तत्कालीन कांग्रेस सरकार के इशारे पर बस्तर के शासक प्रवीर चन्द्र भंजदेव और उनके साथ बड़ी संख्या में आदिवासियों को गोली से भून दिया गया तब डॉ. लोहिया के निर्देश पर स्व. लाडली मोहन निगम बस्तर पहुँचे. जहाँ सरकार ने उन्हे झूठे मुकदमे के अंर्तगत धारा 302 ताजेराते हिन्द का मुलजिम बनाकर जेल में डाल दिया. बाद में लोहिया जी बस्तर के दौरे पर गये और उन्होने बस्तर के गोलीकांड को व्यापक स्तर पर संसद में उठाया. वह पुलिस के शिकार आम आदमी और भारत का लोकतांत्रिक मंदिर कहे जाने वाली संस्था संसद के भविष्य को लेकर था.

बम्बई के टैक्सी ड्राईवरों की हड़ताल में लोहिया शामिल हुए और बम्बई के होटल मजदूरों का जब पहला संगठन बना, जिसे तोड़ने के लिये बम्बई के होटल मालिकों ने उनके नेताओं को निकाल दिया.तब एक बार नही अनेक बार लोहिया उनके साथ छोटे-छोटे कम संख्या वाले धरना प्रर्दशनों में शामिल हुए.

लोहिया जहाँ अन्याय, वहीं प्रतिकार के सिद्धांत को प्रयोग में लाते थे. वे किसी घटना के बाद उसके लिये लम्बी तैयारी के बजाय तत्काल संघर्ष शुरू करने में विश्वास रखते थे. इसीलिये जब वे अमरीका की यात्रा पर गये और उन्हे काले होने के कारण होटल में प्रवेश से रोका गया तो उन्होने दिल्ली लौटकर संसद में उठाने का इंतजार नही किया बल्कि वहीं विरोध कर गिरप्तारी दी. नकी गिरफ्तारी की चर्चा अमरीका के अखबारों में व्यापक रूप से हुई. यहाँ तक उसका प्रभाव हुआ कि अमरीका के राष्ट्रपति को इस घटना के लिये खेद व्यक्त करना पड़ा. राष्ट्रपति के खेद व्यक्त करने पर लोहिया ने उसका प्रत्युत्तर देते हुए कहा कि क्षमा तो उन करोड़ों लोगों से मांगी जानी चाहिये, जो अमरीकी व्यवस्था में रंगभेद का शिकार हो रहे हैं.

वे अपनी निजी यात्रा पर गोवा गये थे और वहाँ के साथियों के आग्रह पर उन्होने गोवा में एक सभा करने की मंजूरी ली थी. पुर्तगाली शासकों ने उनकी सभा को अवैधानिक घोषित कर रोकने का प्रयास किया परन्तु लोहिया ने वहीं उसका प्रतिकार करते हुए उनके आदेश को मानने से इन्कार कर दिया तथा गिरफ्तार हुए. लोहिया की गिरफ्तारी की सूचना मिलने पर महात्मा गाँधी ने सार्वजनिक बयान देकर पुर्तगाली शासन के इस निर्णय की आलोचना की और उसी समय गोवा, जो उस समय तक पुर्तगालियों का उपनिवेश था, की आजादी के आंदोलन की शुरूआत हुई.

जब लोहिया अरूणाचल के दौरे पर गये और उन्हें भारत की सीमा में प्रवेश करने से रोका गया तब लोहिया ने वहीं गिरफतारी दी और सरकारी आदेश को तोड़ा. लोहिया अरूणाचल को उर्वशीयम के नाम से ही घोषित करते थे.

रीवा में किसान आंदोलन की शुरूआत लोहिया की प्रेरणा से हुई थी, जिसमें हजारों किसानों ने रीवा विधानसभा को घेरा था. रीवा राज्य में यह किसान आंदोलन विंध्य की समाजवादी पार्टी के लिये एक मजबूत आधार बना था और इस जनसमर्थन से तथा संभावित राजनैतिक परिवर्तन से भयभीत होकर तत्कालीन केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने 1956 में नये म.प्र. के गठन का उपक्रम किया तथा विंध्य प्रदेश को महाकौशल, छत्तीसगढ़ के साथ शामिल कर अपना बहुमत कायम रखने का षड़यंत्र किया.

उ.प्र. के एक विश्रामगृह से मंत्री को कमरा दिये जाने के नाम पर उनके सामान को हटाये जाने की घटना को उन्होंने देश की संपत्ति पर आम आदमी के अधिकार का प्रश्न बनाया. उस समय तक लोहिया संसद सदस्य नही चुने गये थे,परन्तु सरकारी विश्रामगृह जो जनता के पैसे से बने नये वोट से चुने राजाओं के ऐशगाह या महल नही बल्कि आम जनता के लिये भी है. इस बहस को उन्होंने शुरू किया तथा तत्कालीन सरकार को जन आलोचना का शिकार होकर अपने नियम को बदलना पड़ा.ज्ञान ओर योग्यता की वास्तविक परख भी राष्ट्रभाषा या भारतीय भाषा के आधार पर ही हो सकती है. परन्तु हमारे देश में योग्यता की कसौटी अंग्रेजी भाषा का ज्ञान बन जाना है.लोहिया बदलाव के तीन तरीके बताते थे -(1) जेल (2) फावड़ा और (3) वोट. उन्होंने जन आंदोलन को जेल का पर्याय तथा वोट को राजनीति का पर्याय माना था. वे सदैव कार्यकर्ताओं को जेल जाने को प्रेरित करते थे. जिससे समाजवादी कार्यकर्ता निर्भय बने, उससे आत्मविश्वास पैदा हो और व्यवस्था के नकली शेरों से लड़ने के लिये तैयार हों. उन्होने ''पिछड़े पावे सौ में साठ'' का नारा देकर देश की विषम सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन शुरू किया. लोहिया यह जानते थे कि जब तक देश में जाति प्रथा रहेगी तब तक अमीर और गरीब का वर्ग संघर्ष संभव नही है. इसलिये लोहिया जाति को मिटाना चाहते थे और आम लोगों को आर्थिक, सामाजिक, गरीबी और पिछड़ेपन के आधार पर संगठित करना चाहते थे. उनके इस नारे ने समूची गंगा की पट्टी में भारी हलचल पैदा की ओर संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का बड़ा जनाधार कायम किया.

लोहिया वोट के माध्यम से भी प्रतीक ओर पर्याय खड़ा करते थे तथा वंचित वर्गों को राजनीति के मंच पर अगली कतार में खड़ा करते थे. ग्वालियर के संसदीय चुनाव में लोहिया ने ग्वालियर की पूर्व महारानी स्व.श्रीमती सिंधिया के विरूद्ध एक दलित जमादार परिवार की महिला श्रीमती सुक्खो रानी को पार्टी का प्रत्याशी बनाया था. लोहिया ने चुनाव के कार्यक्रम के रूप में एक बहस शुरू की कि एक तरफ महारानी है, जो शोषण का प्रतीक है और दूसरी तरफ मेहतरानी है जो परिश्रम और संघर्ष का प्रतीक है.सामाजिक परिवर्तन के लिये लोहिया का यह चुनाव मील का पत्थर साबित हुआ तथा देश के उन करोड़ों मतदाताओं के मन में इस एक घटना से आत्मविश्वास का संचार हुआ, जो रानियों और महारानियों के दर्शन के लिये लालायित होकर खड़े रहते थे, वे लोकतांत्रिक सत्ता हासिल करने के लिये अपने अधिकार के प्रति सचेत हुए.

लोहिया जनता की लड़ाई जन भाषा में ही लड़े जाने के पक्षधर थे. वे मानते थे कि भाषा भी गुलामी को बनाये रखने का काम करती है. उनके ही शब्दों में '' भारत को इस समय तीन गुलामियों से लड़ना है- आर्थिक साम्राज्यवाद के रूप में बाहरी गुलामी, जाति व्यवस्था के रूप में आंतरिक गुलामी और वैचारिक और सांस्कृतिक गुलामी. इन तीनों गुलामियों को बनाये रखने का काम इस समय अंग्रेजी भाषा कर रही है.''

भाषा देश के मानसिक विभाजन का आधार तब भी थी और आज भी है. भाषा के आधार पर देश छोटे और बड़े, अमीर और गरीब में बँट जाता है. अंग्रेजी जानने वाले समाज में प्रतिष्ठित हो जाते हैं ओर बड़े बन जाते हैं, जबकि राष्ट्रभाषा और जनभाषायें अज्ञानता और अपढ़ होने का र्प्याय बन जाती हैं. कोई भी देश तभी तरक्की कर सकता है, जब वहाँ के आम आदमी की भाषा राजकीय भाषा हो. ज्ञान ओर योग्यता की वास्तविक परख भी राष्ट्रभाषा या भारतीय भाषा के आधार पर ही हो सकती है. परन्तु हमारे देश में योग्यता की कसौटी अंग्रेजी भाषा का ज्ञान बन जाना है. हिन्दी को बोलने वाले स्वत: अपने आप को छोटा समझने लगते हैं और हीनग्रंथि का शिकार हो जाते हैं. इसीलिये देश की होटलों, बसों, रेलों और हवाई जहाजों में अंग्रेजी भाषा में बतियाने वाले मानसिक गुलामी से भर जाते है.

लोहिया इस हीन ग्रंथि को तोड़ना चाहते थे. उनका अंग्रेजी हटाओं का नारा देश के गरीब ओर आम आदमी में विश्वास पैदा करने का बड़ा संबल बना था. वे अंग्रेजी के ज्ञान के खिलाफ नही थे बल्कि अंग्रेजी सत्ता जो साम्राज्यवाद का बड़ा हथियार था, उसके खिलाफ थे.