शनिवार, 9 अक्तूबर 2010

लोहिया की लड़ाई का रास्ता: रघु ठाकुर

डा राम मनोहर लोहिया

लोहिया आम आदमी के प्रवक्ता थे. वे आम व खास का फर्क मिटाना चाहते थे तथा गरीब के मन में विषमता के प्रति आक्रोश पैदा कर उसे बदला
परिवर्तन की लड़ाई के लिये तैयार करना चाहते थे. उनके चिंतन का मूल आधार ही भेदभाव के खिलाफ संघर्ष और संघर्षशील मन तैयार करने का था.
वे सबसे कमजोर व्यक्ति के मन में सिविल नाफरमानी या सविनय अवज्ञा



के अहिंसक हथियारों के प्रति विश्वास तथा इनके प्रयोग के लिये

आदत


बनाना





चाहते थे.

लोहिया समग्र परिवर्तन में विश्वास रखते थे. उनके ही शब्दों में '' हिन्दुस्तान की सामान्य जनता, मामूली लोग अपने में भरोसा करना शुरू करें कि कल तक जो अंग्रेजी राज था, वह पाजी बन गया तो उसे खत्म किया. आज कांग्रेसी सरकार है वह पाजी बन गई तो उसे खत्म करेंगे. कल मान लो कम्यूनिस्ट सरकार बने व पाजी बन जाये तो उसे भी खत्म करेंगे. परसों सोशलिस्ट सरकार बनेगी, मान लो वह भी पाजी बन जाये तो उसे भी खत्म करेंगे. जिस तरह तवे पर रोटी उलटते-पलटते सेंक लेते हैं, उसी तरह हिन्दुस्तान की सरकार को उलटते-पलटते ईमानदार बनाकर छोड़ेंगे. यह भरोसा किसी तरह हिन्दुस्तान की जनता में आ जाये तो फिर रंग आ जायेगा राजनीति में. ''

लोहिया आम आदमी को लड़ना सिखाकर राजनैतिक परिवर्तन की क्रिया को तेज करना चाहते थे. उनके ही शब्दों में '' बिना हथियारों के अन्याय से लड़ने का तरीका निकालना पड़ेगा. इसका तरीका निकला भी है. सिविल नाफरमानी की क्रिया में न्याय और समता प्राप्त करने की उस मनुष्य की अदम्य प्रवृत्ति प्रकट होती है, जिसके हाथ में हथियार नही है. हथियारों के खात्मे की तरह गरीबी का अंत भी अपने आप नही हो जायेगा. दोनों के लिये लगन के साथ यत्न करना पड़ेगा. हथियार और गरीबी में गरीबी बिलाशक ज्यादा मारक रोग है. ''

लोहिया का हर संघर्ष आम आदमी से जुड़ा हुआ था और आम आदमी का विश्वास जगाने आम और विशेष का फर्क मिटाने, आदमी में आत्म विश्वास और साहस पैदा करने के लिये था. लोहिया बम्बई की यात्रा पर थे और जिस मकान में ठहरे हुए थे, उस मकान के सामने बम्बई की झोपड़ पट्टी के लोग सार्वजनिक नल के सामने लाईन लगाये थे तथा परेशान महिलायें नजर आयीं.

लोहिया ने अपने साथियों से सवाल पूछा कि उन्हें संगठित कौन करेगा ? एक विचारधारा और पार्टी का आधार ऐसे संगठन ही हो सकते है. श्रीमती मृणाल गोरे ने यह जबाबदारी स्वीकार की और बम्बई के झोपड़ पट्टी वालों को संगठित करना शुरू किया तथा पानी के लिये परेशान महिलाओं को संगठित कर सड़कों पर निकलना शुरू किया. कुछ ही समय में मृणाल ताई बम्बई की ‘पानी वाली ताई’ बन गई और बम्बई के उन गरीब आम असंगठित लोगों ने लड़ना सीख लिया, जो मायानगरी की माया के डर से घरों से निकलते नही थे.

उ.प्र. में जब तत्कालीन राज्य सरकार ने सिंचाई की दरें बढ़ाई तब लोहिया ने इस दर वृद्धि के खिलाफ किसानों का आंदोलन शुरू कराया, जिसे नहर रेट आंदोलन कहा गया. उसी आंदोलन की अगुवाई के चलते अर्जुनसिंह भदौरिया को कमाण्डर की उपाधि दी गई और इसी आंदोलन का परिणाम था कि मुलायम सिंह यादव जैसे लोग कमाण्डर साहब का झोला उठाकर एक अति गरीब परिवार से निकलकर आज की पहचान हासिल कर सके.

इस किसान आंदोलन में स्वयं डॉ. राममनोहर लोहिया लम्बे समय जेल में रहे और उ.प्र. में सैकड़ों किसानों को राजनैतिक कार्यकर्ता और नेता बना दिया. जन समस्या के साथ-साथ नये नेतृत्व को गढ़ने की उनकी कला अद्भुत थी, जो आम आदमी को स्वत: नेतृत्व की क्षमता का विश्वास लेकर नेता बनाती थी.

जब वे अमरीका की यात्रा पर गये और उन्हे काले होने के कारण होटल में प्रवेश से रोका गया तो उन्होने दिल्ली लौटकर संसद में उठाने का इंतजार नही किया बल्कि वहीं विरोध कर गिरप्तारी दी.देश में आदिवासियों की जमीन के सवाल को आजादी के बाद सबसे पहले लोहिया ने ही उठाया और तत्कालीन रायपुर जिले से 150 किमी दूर के घने जंगल के गाँव उमरादिहान में जमीन पर खेती करने का आंदोलन चलाया. हजारों बेरोजगार आदिवासियों के लिये यह जमीन की ''मांग जमीन'' का आंदोलन बन गया.

रायपुर के सुदुर क्षेत्रों से लेकर बस्तर तक सैकड़ों गाँव के आदिवासी खेती के लिये जमीन की मांग को लेकर संघर्ष के लिये सड़कों पर निकल पड़े. तीन-तीन पीढ़ियाँ उनकी जेलों में जा चुकी है. हजारों लोग जमीन के मालिक बन चुके हैं. वन भूमि अधिकार विधेयक जो सन् 2006 में भारतीय संसद में पारित हुआ, उसका वास्तविक बीज लोहिया ने ही डाला था.

बस्तर में जब तत्कालीन कांग्रेस सरकार के इशारे पर बस्तर के शासक प्रवीर चन्द्र भंजदेव और उनके साथ बड़ी संख्या में आदिवासियों को गोली से भून दिया गया तब डॉ. लोहिया के निर्देश पर स्व. लाडली मोहन निगम बस्तर पहुँचे. जहाँ सरकार ने उन्हे झूठे मुकदमे के अंर्तगत धारा 302 ताजेराते हिन्द का मुलजिम बनाकर जेल में डाल दिया. बाद में लोहिया जी बस्तर के दौरे पर गये और उन्होने बस्तर के गोलीकांड को व्यापक स्तर पर संसद में उठाया. वह पुलिस के शिकार आम आदमी और भारत का लोकतांत्रिक मंदिर कहे जाने वाली संस्था संसद के भविष्य को लेकर था.

बम्बई के टैक्सी ड्राईवरों की हड़ताल में लोहिया शामिल हुए और बम्बई के होटल मजदूरों का जब पहला संगठन बना, जिसे तोड़ने के लिये बम्बई के होटल मालिकों ने उनके नेताओं को निकाल दिया.तब एक बार नही अनेक बार लोहिया उनके साथ छोटे-छोटे कम संख्या वाले धरना प्रर्दशनों में शामिल हुए.

लोहिया जहाँ अन्याय, वहीं प्रतिकार के सिद्धांत को प्रयोग में लाते थे. वे किसी घटना के बाद उसके लिये लम्बी तैयारी के बजाय तत्काल संघर्ष शुरू करने में विश्वास रखते थे. इसीलिये जब वे अमरीका की यात्रा पर गये और उन्हे काले होने के कारण होटल में प्रवेश से रोका गया तो उन्होने दिल्ली लौटकर संसद में उठाने का इंतजार नही किया बल्कि वहीं विरोध कर गिरप्तारी दी. नकी गिरफ्तारी की चर्चा अमरीका के अखबारों में व्यापक रूप से हुई. यहाँ तक उसका प्रभाव हुआ कि अमरीका के राष्ट्रपति को इस घटना के लिये खेद व्यक्त करना पड़ा. राष्ट्रपति के खेद व्यक्त करने पर लोहिया ने उसका प्रत्युत्तर देते हुए कहा कि क्षमा तो उन करोड़ों लोगों से मांगी जानी चाहिये, जो अमरीकी व्यवस्था में रंगभेद का शिकार हो रहे हैं.

वे अपनी निजी यात्रा पर गोवा गये थे और वहाँ के साथियों के आग्रह पर उन्होने गोवा में एक सभा करने की मंजूरी ली थी. पुर्तगाली शासकों ने उनकी सभा को अवैधानिक घोषित कर रोकने का प्रयास किया परन्तु लोहिया ने वहीं उसका प्रतिकार करते हुए उनके आदेश को मानने से इन्कार कर दिया तथा गिरफ्तार हुए. लोहिया की गिरफ्तारी की सूचना मिलने पर महात्मा गाँधी ने सार्वजनिक बयान देकर पुर्तगाली शासन के इस निर्णय की आलोचना की और उसी समय गोवा, जो उस समय तक पुर्तगालियों का उपनिवेश था, की आजादी के आंदोलन की शुरूआत हुई.

जब लोहिया अरूणाचल के दौरे पर गये और उन्हें भारत की सीमा में प्रवेश करने से रोका गया तब लोहिया ने वहीं गिरफतारी दी और सरकारी आदेश को तोड़ा. लोहिया अरूणाचल को उर्वशीयम के नाम से ही घोषित करते थे.

रीवा में किसान आंदोलन की शुरूआत लोहिया की प्रेरणा से हुई थी, जिसमें हजारों किसानों ने रीवा विधानसभा को घेरा था. रीवा राज्य में यह किसान आंदोलन विंध्य की समाजवादी पार्टी के लिये एक मजबूत आधार बना था और इस जनसमर्थन से तथा संभावित राजनैतिक परिवर्तन से भयभीत होकर तत्कालीन केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने 1956 में नये म.प्र. के गठन का उपक्रम किया तथा विंध्य प्रदेश को महाकौशल, छत्तीसगढ़ के साथ शामिल कर अपना बहुमत कायम रखने का षड़यंत्र किया.

उ.प्र. के एक विश्रामगृह से मंत्री को कमरा दिये जाने के नाम पर उनके सामान को हटाये जाने की घटना को उन्होंने देश की संपत्ति पर आम आदमी के अधिकार का प्रश्न बनाया. उस समय तक लोहिया संसद सदस्य नही चुने गये थे,परन्तु सरकारी विश्रामगृह जो जनता के पैसे से बने नये वोट से चुने राजाओं के ऐशगाह या महल नही बल्कि आम जनता के लिये भी है. इस बहस को उन्होंने शुरू किया तथा तत्कालीन सरकार को जन आलोचना का शिकार होकर अपने नियम को बदलना पड़ा.ज्ञान ओर योग्यता की वास्तविक परख भी राष्ट्रभाषा या भारतीय भाषा के आधार पर ही हो सकती है. परन्तु हमारे देश में योग्यता की कसौटी अंग्रेजी भाषा का ज्ञान बन जाना है.लोहिया बदलाव के तीन तरीके बताते थे -(1) जेल (2) फावड़ा और (3) वोट. उन्होंने जन आंदोलन को जेल का पर्याय तथा वोट को राजनीति का पर्याय माना था. वे सदैव कार्यकर्ताओं को जेल जाने को प्रेरित करते थे. जिससे समाजवादी कार्यकर्ता निर्भय बने, उससे आत्मविश्वास पैदा हो और व्यवस्था के नकली शेरों से लड़ने के लिये तैयार हों. उन्होने ''पिछड़े पावे सौ में साठ'' का नारा देकर देश की विषम सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन शुरू किया. लोहिया यह जानते थे कि जब तक देश में जाति प्रथा रहेगी तब तक अमीर और गरीब का वर्ग संघर्ष संभव नही है. इसलिये लोहिया जाति को मिटाना चाहते थे और आम लोगों को आर्थिक, सामाजिक, गरीबी और पिछड़ेपन के आधार पर संगठित करना चाहते थे. उनके इस नारे ने समूची गंगा की पट्टी में भारी हलचल पैदा की ओर संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का बड़ा जनाधार कायम किया.

लोहिया वोट के माध्यम से भी प्रतीक ओर पर्याय खड़ा करते थे तथा वंचित वर्गों को राजनीति के मंच पर अगली कतार में खड़ा करते थे. ग्वालियर के संसदीय चुनाव में लोहिया ने ग्वालियर की पूर्व महारानी स्व.श्रीमती सिंधिया के विरूद्ध एक दलित जमादार परिवार की महिला श्रीमती सुक्खो रानी को पार्टी का प्रत्याशी बनाया था. लोहिया ने चुनाव के कार्यक्रम के रूप में एक बहस शुरू की कि एक तरफ महारानी है, जो शोषण का प्रतीक है और दूसरी तरफ मेहतरानी है जो परिश्रम और संघर्ष का प्रतीक है.सामाजिक परिवर्तन के लिये लोहिया का यह चुनाव मील का पत्थर साबित हुआ तथा देश के उन करोड़ों मतदाताओं के मन में इस एक घटना से आत्मविश्वास का संचार हुआ, जो रानियों और महारानियों के दर्शन के लिये लालायित होकर खड़े रहते थे, वे लोकतांत्रिक सत्ता हासिल करने के लिये अपने अधिकार के प्रति सचेत हुए.

लोहिया जनता की लड़ाई जन भाषा में ही लड़े जाने के पक्षधर थे. वे मानते थे कि भाषा भी गुलामी को बनाये रखने का काम करती है. उनके ही शब्दों में '' भारत को इस समय तीन गुलामियों से लड़ना है- आर्थिक साम्राज्यवाद के रूप में बाहरी गुलामी, जाति व्यवस्था के रूप में आंतरिक गुलामी और वैचारिक और सांस्कृतिक गुलामी. इन तीनों गुलामियों को बनाये रखने का काम इस समय अंग्रेजी भाषा कर रही है.''

भाषा देश के मानसिक विभाजन का आधार तब भी थी और आज भी है. भाषा के आधार पर देश छोटे और बड़े, अमीर और गरीब में बँट जाता है. अंग्रेजी जानने वाले समाज में प्रतिष्ठित हो जाते हैं ओर बड़े बन जाते हैं, जबकि राष्ट्रभाषा और जनभाषायें अज्ञानता और अपढ़ होने का र्प्याय बन जाती हैं. कोई भी देश तभी तरक्की कर सकता है, जब वहाँ के आम आदमी की भाषा राजकीय भाषा हो. ज्ञान ओर योग्यता की वास्तविक परख भी राष्ट्रभाषा या भारतीय भाषा के आधार पर ही हो सकती है. परन्तु हमारे देश में योग्यता की कसौटी अंग्रेजी भाषा का ज्ञान बन जाना है. हिन्दी को बोलने वाले स्वत: अपने आप को छोटा समझने लगते हैं और हीनग्रंथि का शिकार हो जाते हैं. इसीलिये देश की होटलों, बसों, रेलों और हवाई जहाजों में अंग्रेजी भाषा में बतियाने वाले मानसिक गुलामी से भर जाते है.

लोहिया इस हीन ग्रंथि को तोड़ना चाहते थे. उनका अंग्रेजी हटाओं का नारा देश के गरीब ओर आम आदमी में विश्वास पैदा करने का बड़ा संबल बना था. वे अंग्रेजी के ज्ञान के खिलाफ नही थे बल्कि अंग्रेजी सत्ता जो साम्राज्यवाद का बड़ा हथियार था, उसके खिलाफ थे.

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