मंगलवार, 1 जनवरी 2019

नए साल में

नए साल में
( हर साल के लिए )
1.
इस नए साल में
आप देखने लगें।
और देखे तो
और भी देखने की कोशिश करें।
आँख खुद से बंद न करें।
कोई पूछे
इससे पहले
देखने की घोषणा कर दे।
देखे तो
करीब का भी देखे
दूर का भी।
और आपके देखने से
दृश्य कदापि न बदले।

2.
आप सुनने लगें
वाकई इस तरह
कि
सुनाने वाले को हो भरोसा
सुन ली गई है हमारी
वाकई
सुने
तो वही सुने
जो बोला गया हो
सुने उसकी भी
जो बोलना चाहता है
मगर बुदबुदा ही पाता है।
और उसकी तो जरूर सुने
जिसे
बोलने की मनाही है।

3.
आप बोलने लगें
जितना भी बोलें
उतना तो बोलें।
अपने लिए बोले
मगर
उसके लिए जरूर बोलें।
जिन्होंने आपसे
देखने
सुनने
की उम्मीद बना रखी है।
आपकी आवाज़
आपसे प्रभावित हो।
आपकी आवाज़
से आप प्रभावित हो।

4.
आप बोले कि जरूरी है।
अब बोलना
आप देखे कि जरूरी है।
अब देखना
आप सुने कि जरूरी है।
अब सुनना।
बिना पक्ष हुए
बिना विपक्ष हुए।
आपके लिए दुआ है मेरी
और खुद के लिए
न्यू ईयर रेज़ल्यूशन।

बुधवार, 5 दिसंबर 2018

शांति से जीने नहीं दे रहा है।।

हे महामानव
इसपर कि तुमने उठा के कांधे पे पूरी धरती को
घंटो बतियाते रहे
धरम की भाषा में
विज्ञान की परिभाषा में
विश्वास और अविश्वास की संहिता लिए
और कभी ये नहीं कहा कि
सदियों से है
तुम्हारे ऊपर
पूरी धरती का भार
( खुद का थोपा )
मजहब की एक पूरी दीवार
जो उगा रक्खी है
अपने सीने पे
कि जिससे
स्वर्ग का रस्ता
और नरक की सीढ़ी
दिखा दिखा के
हमारी स्वर्ग सी
जिंदगी
को
नरक बना दिया
तुम सब
चंद महामानवों ने
हमारी आसान सी जिंदगी को
सरहदों में जकड़ दिया
हम जो यूं ही हँस सकते हैं
और
रो सकते है
भावुक होने पे
को बिल्कुल नयी वसीयत में
नाप दिया
हे महामानव
तुम कुछ मुट्टी भर
और
फैल गए हमारे पूरे अतीत पे
ग्रस रहे हो
हमारा पूरा वर्तमान
और भविष्य
तो है ही नहीं
किसी का
सिवाय
तुम्हारी जमात के
कुछ चंद महामानवों के
जो अगली कुछ सदी में
पैदा होने वाले है।
हे महामानव
हम जो बिना नाम के मर जाते हैं
जी भी लेते हैं
आसानी से बिना पहचान बनाये
नहीं सोचते हैं
कि मरने के बाद क्या होगा
और जन्म से पहले क्या था।
को
तुम्हारे जटिल
दार्शनिक विमर्श
आध्यात्मिक सूत्र
मज़हबी संदेश
जैसे
भारी भरकम सवाल
और अबूझ जवाब
शांति से जीने नहीं दे रहा है।

गुरुवार, 17 मई 2018

मेरी कविता

दुःख की घड़ी में

मेरे साथ रहती है

मेरी प्रेयसी मेरी कविता

हाथों में लिए

ढाढ़स के अनगिणत शब्द

और

सुख के क्षण में

बिखरती रहती है

मेरी प्रेयसी मेरी कविता

गंध और स्पर्श के सहारे

जब मैं कटता हूँ दुनिया से

एकमात्र

मेरी कविता मुझसे जुड़ती है

अनुभूति की बाहें फैलाकर

और

जब मैं रमता हूँ दुनिया में

मेरी कविता ही बनती है

माध्यम

अभिव्यक्ति की

शोक में हर्ष में

अपकर्ष और उत्कर्ष में

रण और वन में

हरपल मेरे मन में

विचरती रहती है

मेरी प्रेयसी मेरी कविता

मैं समाता हूँ

अपनी कविता की इयत्ता में

और यही

दुनिया में अकेली

मेरी परवाह करती है

मैं देता हूँ इसे

रूप

यह देती है मुझे

परिभाषा

दुनिया के सारे

अर्थ, संबंध, रिश्ते, भाव, राग

उस मुकाम पर

पहुँचने का साधन मात्र है

जहाँ

मैं और मेरी प्रेयसी

निर्बाध मिल सके

मेरी प्रेयसी कविता

मेरी अंतिम खोज है .

सोमवार, 22 जनवरी 2018

पढ़ो और लिखो पर....

पढ़ो
पढ़ते रहो
और
अपने समय मे पढ़ते दिखो
गीता रामायण से फिल्मी कलियाँ तक पढो।
पढो कि
हमारा देश था सोने की चिड़िया
पढो कि परमाणु बम भी हमारे पास है
कि सभ्यता की जननी
विश्वगुरु हैं हम
कि अनुष्का की शादी इटली में हुई विराट के साथ
मगर इसके बीच
मत पढ़ लेना
भात भात कहके मर गयी है मुनिया
और ऑक्सीजन के बिना नवजात
कि हमारी नदियों का पानी
हमारी धरती की उर्वरा
और नीला आसमान
चोरी चला गया है खुले में
कि खाई और चौड़ी हो रही है।
अख़लाक़ मर गया है।
क्योंकि इसे पढ़ने के बाद
पड़ोसी से गप्प लगाना
मुश्किल हो जाएगा।
फिर आप अपनी बेटी से आंख नहीं मिला पाएंगे।
जिसे पढ़ के आप विचलित नहीं हो सकते
उसे मन लगा के पढो।
और लिखो
खूब लिखो
लिखते रहो
अपने समय मे लिखते दिखो
पन्ना दर पन्ना
अखबार के अखबार लिख दो
लिख दो के
आनेवाला कल हमारा है
कि हमने सीखा दी है पाकिस्तान को सबक
और अमेरिका तो अब लट्टू हुआ ही जा रहा है
और चीन भी सुधर गया है।
कि बहार ही बहार है।
देश अब तैयार है।
अर्थव्यवस्था और जीडीपी
चढ़ रहा है
देश आगे बढ़ रहा है।
मगर इस आगे बढ़ते हुए देश में
क्या छूट रहा है
इस पर कभी मत लिखना
कभी मत लिखना
जाति धर्म सम्प्रदाय की असलियत पे
किसी कलबुरगी की तरह
कि तुम्हारी पत्नी तुम्हारी राह
रोज तकती रहती है।
लिख के असहमत होने की कला
से बचो
तो बचे रह सकते हो
नहीं तो
गौरी लंकेश को तो भूल ही चुकी है जनता।

शनिवार, 12 अप्रैल 2014

और घर के अन्दर से आती आवाज़ को .


तब भी हाँ करने की देर थी
तुम्हारे पास
जिससे होकर मेरी पूरी जिंदगी
फिसल गई
कितने गीत लिख डाले मैंने
कितनी कहानियां रच डाली
मगर मेरे मन का स्याह एकाकीपन
किसी को सुना नहीं पाया
दिखा नहीं पाया
अपनी ही लौटती आवाजों का
उत्तर देती रही मैं
इस तरह बचाती रही कल के लिए
अपनी उम्मीद
कि
कहीं तुम चले आए तो खोजोगे
एक मीठी नदी को
पीपल की छांव को
और घर के अन्दर से आती आवाज़ को .

सदी अपने सबसे बड़े राजा की पालकी सज़ा रहा होगा

क्या कहोगी तुम 
कि जबकि तुम्हारा समय 
तुम्हारे पीछे से भाग खड़ा होगा 
और 
पहाड़ से उतरती सड़क की तरह
तुम्हारी जवानी 
फिर लौट नहीं सकेगी 
कोई मछुआरा फिर जाल नहीं डाल पाएगा
धरती के उस कोने की कोख 
उगा नहीं पाएगी 
फूल शूल कुछ भी
तुम्हारे बालों की महक 
उतर जाएगी 
फिर कोई नहीं आएगा 
फिर कोई नहीं आएगा 
सदी अपने सबसे बड़े राजा की पालकी सज़ा रहा होगा 
शायद !!

शुक्रवार, 21 मार्च 2014

ये जो है सो है
परेशान क्यों होते हो
तुम्हारी नदी
तुम्हारे खेत
तुम्हारे जंगल
तुम्हारे नहीं रहेंगे
तुम्हारे वोटों के साथ
ये भी चले जाएंगे
किसी को देश का कर्णधार बनाने .