गुरुवार, 17 मई 2018

मेरी कविता

दुःख की घड़ी में

मेरे साथ रहती है

मेरी प्रेयसी मेरी कविता

हाथों में लिए

ढाढ़स के अनगिणत शब्द

और

सुख के क्षण में

बिखरती रहती है

मेरी प्रेयसी मेरी कविता

गंध और स्पर्श के सहारे

जब मैं कटता हूँ दुनिया से

एकमात्र

मेरी कविता मुझसे जुड़ती है

अनुभूति की बाहें फैलाकर

और

जब मैं रमता हूँ दुनिया में

मेरी कविता ही बनती है

माध्यम

अभिव्यक्ति की

शोक में हर्ष में

अपकर्ष और उत्कर्ष में

रण और वन में

हरपल मेरे मन में

विचरती रहती है

मेरी प्रेयसी मेरी कविता

मैं समाता हूँ

अपनी कविता की इयत्ता में

और यही

दुनिया में अकेली

मेरी परवाह करती है

मैं देता हूँ इसे

रूप

यह देती है मुझे

परिभाषा

दुनिया के सारे

अर्थ, संबंध, रिश्ते, भाव, राग

उस मुकाम पर

पहुँचने का साधन मात्र है

जहाँ

मैं और मेरी प्रेयसी

निर्बाध मिल सके

मेरी प्रेयसी कविता

मेरी अंतिम खोज है .

सोमवार, 22 जनवरी 2018

पढ़ो और लिखो पर....

पढ़ो
पढ़ते रहो
और
अपने समय मे पढ़ते दिखो
गीता रामायण से फिल्मी कलियाँ तक पढो।
पढो कि
हमारा देश था सोने की चिड़िया
पढो कि परमाणु बम भी हमारे पास है
कि सभ्यता की जननी
विश्वगुरु हैं हम
कि अनुष्का की शादी इटली में हुई विराट के साथ
मगर इसके बीच
मत पढ़ लेना
भात भात कहके मर गयी है मुनिया
और ऑक्सीजन के बिना नवजात
कि हमारी नदियों का पानी
हमारी धरती की उर्वरा
और नीला आसमान
चोरी चला गया है खुले में
कि खाई और चौड़ी हो रही है।
अख़लाक़ मर गया है।
क्योंकि इसे पढ़ने के बाद
पड़ोसी से गप्प लगाना
मुश्किल हो जाएगा।
फिर आप अपनी बेटी से आंख नहीं मिला पाएंगे।
जिसे पढ़ के आप विचलित नहीं हो सकते
उसे मन लगा के पढो।
और लिखो
खूब लिखो
लिखते रहो
अपने समय मे लिखते दिखो
पन्ना दर पन्ना
अखबार के अखबार लिख दो
लिख दो के
आनेवाला कल हमारा है
कि हमने सीखा दी है पाकिस्तान को सबक
और अमेरिका तो अब लट्टू हुआ ही जा रहा है
और चीन भी सुधर गया है।
कि बहार ही बहार है।
देश अब तैयार है।
अर्थव्यवस्था और जीडीपी
चढ़ रहा है
देश आगे बढ़ रहा है।
मगर इस आगे बढ़ते हुए देश में
क्या छूट रहा है
इस पर कभी मत लिखना
कभी मत लिखना
जाति धर्म सम्प्रदाय की असलियत पे
किसी कलबुरगी की तरह
कि तुम्हारी पत्नी तुम्हारी राह
रोज तकती रहती है।
लिख के असहमत होने की कला
से बचो
तो बचे रह सकते हो
नहीं तो
गौरी लंकेश को तो भूल ही चुकी है जनता।

शनिवार, 12 अप्रैल 2014

और घर के अन्दर से आती आवाज़ को .


तब भी हाँ करने की देर थी
तुम्हारे पास
जिससे होकर मेरी पूरी जिंदगी
फिसल गई
कितने गीत लिख डाले मैंने
कितनी कहानियां रच डाली
मगर मेरे मन का स्याह एकाकीपन
किसी को सुना नहीं पाया
दिखा नहीं पाया
अपनी ही लौटती आवाजों का
उत्तर देती रही मैं
इस तरह बचाती रही कल के लिए
अपनी उम्मीद
कि
कहीं तुम चले आए तो खोजोगे
एक मीठी नदी को
पीपल की छांव को
और घर के अन्दर से आती आवाज़ को .

सदी अपने सबसे बड़े राजा की पालकी सज़ा रहा होगा

क्या कहोगी तुम 
कि जबकि तुम्हारा समय 
तुम्हारे पीछे से भाग खड़ा होगा 
और 
पहाड़ से उतरती सड़क की तरह
तुम्हारी जवानी 
फिर लौट नहीं सकेगी 
कोई मछुआरा फिर जाल नहीं डाल पाएगा
धरती के उस कोने की कोख 
उगा नहीं पाएगी 
फूल शूल कुछ भी
तुम्हारे बालों की महक 
उतर जाएगी 
फिर कोई नहीं आएगा 
फिर कोई नहीं आएगा 
सदी अपने सबसे बड़े राजा की पालकी सज़ा रहा होगा 
शायद !!

शुक्रवार, 21 मार्च 2014

ये जो है सो है
परेशान क्यों होते हो
तुम्हारी नदी
तुम्हारे खेत
तुम्हारे जंगल
तुम्हारे नहीं रहेंगे
तुम्हारे वोटों के साथ
ये भी चले जाएंगे
किसी को देश का कर्णधार बनाने .

शनिवार, 24 नवंबर 2012

बुढ़िया

आदरविहीन संबोधन है-
बुढ़िया
रिश्तों की दुनिया से अवकाशप्राप्त
प्यार के पेंसन के लिए भटकती
भिखमंगे की अवस्थाबोध लिए
दया की दरकार करती
समझो
मेरी दादी वही हो गयी है
बुढ़िया
माँ की नज़रों में
वह काम नहीं कर सकती है
इसलिए
पापा कहते है
मुफ्तखोर
फ्लैट के उस कोने में
जहाँ
मै टॉमी को बांधता था
बिस्तर लगा है
बुढ़िया
यानि मेरी दादी का
माँ की जो साड़ी
पहले कामवाली बाई ले जाती थी
अब पहनती है
बुढ़िया
यानी मेरी दादी
कल जब सिन्हा आंटी आयी थी
तो
माँ ने कहा था
उनके गांव की है
बुढ़िया
वह हमेशा राम - राम जपती रहती है
डेली सोप के समय
माँ चीखती है
पागल बुढ़िया
चुप रहो
मै उससे मिल नहीं सकता
वह बीमार है
स्कूल से लौटने पर
उसे दूर से देख सकता हूँ
उसके हाथ कांपते रहते है
वह दिन में कई बार
अपनी गठरी खोलती है
टटोलती है
मानों कुछ
खोज रही हो
और फिर बंद कर देती है
माँ कहती है
काफ़ी भद्दी और लालची है बुढ़िया
एकदम देहाती गंवार है
मगर
बुढ़िया मेरे लिए आश्चर्य है
जब मुझे पता लगा
कि
वह मेरे पापा की माँ है
तो
मुझे विश्वास नहीं हुआ
क्या माँ ऐसी होती है ?
एक दिन
उसने मुझे
पास बुलाकर एक मिठाई दी
और कहा -" खा "
मै खाने को ही था
कि
माँ ने आकर
मेरे हाथ झटक दिए
कहा -
जहर है मत खा
फिर बुढ़िया से कहा
इस मिठाई की तरह
तुम्हारा दिमाग भी सड़ गया है
वह रोज नहीं नहा पाती
वह बदबू देती है
उसके बर्तन अलग हैं
महाराज उसके लिए
अलग से खाना बनाता है
बुढ़िया यानी
मेरी दादी से
कोई बात नहीं करता
सिवाय उस महरी के
जो झाड़ू लगाने आती है
फिर भी
वह बड़बड़ाती रहती है
कभी-कभी
वह रोने लगती है
जबकि
उसे कोई मारता नहीं है
माँ कहती है
नाटक
मैंने जब माँ से पूछा -
बुढ़िया
यहाँ क्यूँ आई है
तो
माँ ने हँसते हुए कहा -
मरने के लिए!

शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

यहाँ जन गण भी भाग्यविधाता है


चलो निकलो घर से
छुटभैये कवि
अपनी दो टके की
सतही कविता के साथ
इस क्रांति में वे ही असरदार होंगे
खालिस तुकबंदी भी चलेगी
और पैरोडी भी
विचारधारा विहीन इस उथल पुथल के दौर में
कोई भी स्थापित कवि
क्रांति के गीत नहीं गाएगा
उन्होंने अपने शब्द छुपा लिए हैं।
माँगने पर ठुकरा देते हैं।
क्योंकि कुर्सियां बढ़ा दी गई है कतार में
रुका पड़ा है सम्मान समारोह उनके इंतजार में
अब सारी जिम्मेवारी तुम्हारे ऊपर
तुम जो अबतक पढ़े नहीं गए
तुमने जो कभी अच्छा नहीं लिखा
चाहकर भी दोयम दर्जे से निकल नहीं पाए
अपनी समझ में आनेवाली
साधारण सी कविता में पिरो दो
हमारे साधारण से सारे दुःख दर्द।
ऐसी कविता बिना आलोचकों के सिफारिश से
पहुँच सकती है हम तक
फंसती नहीं किसी
पत्र -पत्रिका या पुस्तक के महाजाल में
फेसबुक पर तैरती हुई
ट्विटर पर उड़ती हुई
ट्रक के पीछे लटककर
बसों में चिपककर
रेलगाड़ी में छुपकर
छा जाती है
गली, नुक्कड़, चौराहे
घर और हाट-बाजार तक।
भूल से भी छपकर मर नहीं जाती
तमगे दिवस को जिन्दा होने के लिए
और इसे
विश्वविद्यालय का कब्रिस्तान भी दफनाता नहीं
तुम्हारी कविता बेशक कविता होगी
गोकि तुम कवि नहीं माने जाते
'ऐरे गैरे नत्थू खैरे' तुम कहोगे-
केवल बड़े नहीं निर्माता है
यहाँ जन गण भी भाग्यविधाता है।