बुधवार, 10 नवंबर 2010

संजीवनी है तुम्हारी आहट

संजीवनी है तुम्हारी आहट
जिससे जिन्दा होती है मेरी वैयक्तिकता
मै जो करते-करते कार्य
हो जाता हूँ यंत्र,
तब
सामान्य होने का सुख बटोरता हूँ
जब
तुम देती हो
एक छोटी आवाज़
झील के उस पार से
इधर
कमरे में ताज़ी हवा घुस आती है
पुस्तकों में सिमटे शब्द
बिस्तर पर उतर आते हैं
और मैं
करीने से पलटता हूँ
फिर से
अपनी जिंदगी की किताब को
दुनिया की असंख्य संबोधनों में से
यह एक काफी है
जो मुझे मरने नहीं देगी
खास मेरे लिए
जब एक स्वर तैरती है
तुम्हारी
मंदिर में बजती है भोर की घंटी
नदी में उठती है कुंवारी लहर
हवा सोये फूलों को जगा जाती है
और मैं
फिर से गढ़ता हूँ एक परिभाषा
अपने लिए
क्योंकि
जिंदगी ने कम ही दिए हैं
ऐसे मौके
जब
मेरी संवेदना मेरे शरीर को महसूस करती है .

शनिवार, 6 नवंबर 2010

समय ठहरा रहेगा तब तक

पूरी गर्मजोशी के साथ
मैं उस क्षण
भी
करूँगा तुम्हारा स्वागत
जब
शरीर मुर्झा चुकी होगी
आँखों ने बोलना
और
मस्तिष्क ने समझाना
बंद कर दिया होगा
एक-एक कर ढेरों
कलैंडर
उतर चुके होंगे दीवार से .
मैं दीवार पर
एक नया कलैंडर खिलाऊंगा
और फूलदान से
बासी फूलों को निकाल
उसमें
ताजे फूलों के साथ
शेष बची जिंदगी को भी
सजा दूंगा.
समय ठहरा रहेगा तब तक.

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

और तुम भी .


कभी ऐसा भी होता है
कभी ऐसा ही होता है
और
एक रौशनी चली जाती है
बिना किसी को प्रकाशित किये
फिर
हाथ जो बने है
स्पर्श को संज्ञा प्रदान करने के लिए
अनछुए ही लौट आते है
पहलु में
कभी - कभी कोई यायावर
पूरी तैयारी के बावजूद
कहीं नहीं जाता है
और
शहर का सबसे पढ़ा - लिखा व्यक्ति
मर जाता है
किताबों को आलमारी में कैद किये
इधर
रात के प्रहरी की आवाज़
गुज़र जाती है
कानों के बिलकुल करीब से
हम जागते नहीं
फिर
पागलों की जमात में बैठा
नया पागल कहता है
अभी भी वक़्त चाहिए
अभी भी ओ खुदा
तुम्हारी दुनिया बन ही रही है
और तुम भी ।

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

मेरी प्रेयसी मेरी कविता

दुःख की घड़ी में

मेरे साथ रहती है
मेरी प्रेयसी मेरी कविता
हाथों में लिए
ढाढ़स के अनगिणत शब्द
और
सुख के क्षण में
बिखरती रहती है
मेरी प्रेयसी मेरी कविता
गंध और स्पर्श के सहारे
जब मैं कटता हूँ दुनिया से
एकमात्र
मेरी कविता मुझसे जुड़ती है
अनुभूति की बाहें फैलाकर
और
जब मैं रमता हूँ दुनिया में
मेरी कविता ही बनती है
माध्यम
अभिव्यक्ति की
शोक में हर्ष में
अपकर्ष और उत्कर्ष में
रण और वन में
हरपल मेरे मन में
विचरती रहती है
मेरी प्रेयसी मेरी कविता
मैं समाता हूँ
अपनी कविता की इयत्ता में
और यही
दुनिया में अकेली
मेरी परवाह करती है
मैं देता हूँ इसे
रूप
यह देती है मुझे
परिभाषा
दुनिया के सारे
अर्थ, संबंध, रिश्ते, भाव, राग
उस मुकाम पर
पहुँचने का साधन मात्र है
जहाँ
मैं और मेरी प्रेयसी
निर्बाध मिल सके
मेरी प्रेयसी कविता
मेरी अंतिम खोज है .