शनिवार, 6 नवंबर 2010

समय ठहरा रहेगा तब तक

पूरी गर्मजोशी के साथ
मैं उस क्षण
भी
करूँगा तुम्हारा स्वागत
जब
शरीर मुर्झा चुकी होगी
आँखों ने बोलना
और
मस्तिष्क ने समझाना
बंद कर दिया होगा
एक-एक कर ढेरों
कलैंडर
उतर चुके होंगे दीवार से .
मैं दीवार पर
एक नया कलैंडर खिलाऊंगा
और फूलदान से
बासी फूलों को निकाल
उसमें
ताजे फूलों के साथ
शेष बची जिंदगी को भी
सजा दूंगा.
समय ठहरा रहेगा तब तक.

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति....

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  2. ओह! यही तो प्रेम की दिव्यता है उसका सच्चा स्वरूप है।
    जब दर्पण भी तुमको डराने लगे
    जवानी भी दामन छुडाने लगे
    तब तुम मेरे पास आना प्रिय

    ये गाना याद आ गया।

    वैसे प्रेम तो वो ही है जहाँ अपनी चाह न हो और जिसे चाहते हों उसे हर हाल मे चाह्ते रहें हर रूप मे………………।बेहद उम्दा प्रस्तुति।

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